रायपुर

मीडिया और मदद

मीडिया और मदद

मीडिया और मदद                     आज देश का मीडिया कोरोना वायरस से अपनी जान हथेली पर  लेकर अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझते हुए निभा रहा है l इस कठिन दौर पर अगर लोगों के पास सच्ची और अच्छी सूचनाएं नहीं होंगी तो मुझे लगता है कि कोरोना वायरस की इस लड़ाई मैं देश की जनता को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, और कोरोना से जीत की राह भी  आसान नहीं होगी l ऐसे तमाम आशंकाओं को देखते हुए और अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझते, जिस तरीके से मीडिया ने अपना कार्य किया है और निरंतर कर रही है, उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं l  शायद इसीलिए केंद्र सरकार सहित राज्य के तमाम सरकारों ने मीडिया की भूरी - भूरी प्रशंसा की और करना भी चाहिए, परंतु मैं आज मीडिया का एक सिपाही होने के कारण एक प्रश्न उठाना चाहता हूं , की जिस तरीके से देश की केंद्र सहित तमाम राज्य सरकारों ने डॉक्टरों, पुलिस कर्मी, स्वास्थ्य कर्मचारी , सफाई कर्मचारी सहित अन्य आवश्यक कार्य में लगे कर्मचारी के लिए राहत पैकेज सहित बीमा की बात कही,वहीं देश की सभी सरकारों ने मीडिया के लिए कुछ भी घोषणाएं नहीं की केवल मीडिया  को कर्तव्यपथ पर चलने के लिए जिम्मेदारियों का एहसास के अलावा  आम जनता तक सूचना कैसे पहुंच सके, इसके लिए केवल  मीडिया कर्मियों के पास जारी करने व एडवाइजरी के अलावा कुछ भी नहीं किया गया , यह एक बड़ा अफसोस जनक पहलू है l अब रही बात आखिर ऐसा क्यों किया गया ? केंद्र सहित राज्य सरकारों को इस तरह मीडिया को नजर अंदाज किया जाना चाहिए था ? मीडिया के साथी इस संकट की घड़ी में देश सहित सभी राज्यों की सरकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर  देश सेवा में अपना योगदान दे रही है अपनी जान का परवाह किए बगैर उसके बाद भी उनके साथ ऐसा सलूक समझ से परे है l  क्या मीडिया के साथियों  को कोरोना वायरस के  संक्रमण से डर नहीं लगता ? क्या  उनको अपने परिवार की परवाह नहीं ? क्या मीडिया के साथी समाज का हिस्सा नहीं ? क्या कोरोना वायरस का इन्फेक्शन मीडिया के साथियों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल पाएगा ? इस तरह की तमाम पहलुओं पर आज हमें विचार करने की आवश्यकता है l एक तरफ तो सभी सरकारे समय-समय पर मीडिया को नसीहत देते रहती हैं, उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है l देश के तमाम राजनेता चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या पार्टी के हो मीडिया को नसीहत देना नहीं  भूलती, वे लोग मीडिया के समाचारों को अपने पक्ष  मैं जब पाते हैं तब तक मीडिया उनके लिए निष्पक्ष रहता है , जैसे ही मीडिया साफगोई से सच्चाई का बखान करती है,वैसे ही वह मीडिया को न जाने कभी गोदी मीडिया, पीत पत्रकारिता, दलाल मीडिया सहित कई नाम की संज्ञा दे देती है l देश की तमाम सरकारें चाहे वह कोई भी पार्टी का हो वे मीडिया का उपयोग और उपभोग तो करना चाहती है, परंतु मीडिया को देने के समय अपना पल्ला झाड़ लेती है और मौन व्रत धारण कर लेती है जैसे कि मीडिया इस देश का कोई अंग ही ना हो l देश की तमाम सरकारों ने कोरोना से लड़ने वालों को कोरोना वेरियस के साथ साथ देवदूत तक की संज्ञा दी है, परंतु मीडिया के लिए उन्हें कर्तव्य बोध का एहसास दिलाने के सिवा आज सरकारों ने कुछ नहीं दिया है l आज मीडिया की स्थिति किसी से छुपी नहीं है l  मीडिया को आज भी न्यायपालिका के अधिकतर मामलों पर बंदिश लगी हुई है ,परंतु जब उसी न्यायपालिका के लोगों को अपनी बात जनमानस तक पहुंचाने की आवश्यकता पड़ी और देश के तमाम बड़े  पार्टियां सहित  विपक्ष जब उनका साथ नहीं दी तब उन्होंने मीडिया के शरण में आते हुए सार्वजनिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी पीड़ा का बखान  करना पड़ा तब मीडिया उनके लिए कितनी आवश्यक हो गई थी,ये न्यायपालिका सहित देश की जनता ने देखा है l आज फिर मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है,की आखिर क्यों मीडिया पर जीएसटी लगा ? क्या मीडिया व्यापार कर रही है l  जीएसटी तो व्यापार पर लगता है l फिर अगर हम व्यापार कर रहे हैं, तो यह तमाम सरकारें हमें सेवा करने का पाठ क्यों पढ़ा रही है l एक तरफ तो मीडिया पर नित नए फैसले लिए जा रहे हैं l  मीडिया के स्वतंत्रता पर ही आज प्रश्नचिन्ह लगने लगा है l एक और जहां PRB act सहित सरकुलेशन जांच की एजेंसियों के तौर तरीके बदले जा रहे हैं l डीएवीपी नित नए एडवाइजरी जारी कर मीडिया के मन में भय का वातावरण निर्मित कर रहे हैं , वही आर एन आई  सहित  सभी राज्य सरकारों के जनसंपर्क विभाग इससे अछूते नहीं रही है l आज के दौर में मीडिया याने महंगे संसाधनों का उपकरण हम कह सकते हैं, चाहे समाचार पत्र हो या इलेक्ट्रॉनिक चैनल, करोड़ों रुपए के संसाधनों के साथ ही इसका संचालन किया जाना संभव  है l वही कुछ छोटे और मझोले समाचार पत्र ही तो है जो आज पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलने का प्रयास कर देश की एकता और अखंडता सहित तमाम कुरीतियों को दूर करने  का बीड़ा उठाई हुई है और इन सरकारों द्वारा मीडिया को किस तरह से पूंजीपति के हाथों की कठपुतली बनाया जाए,इसकी ओर शायद ज्यादा ध्यान दे रही है l तभी तो देश के कई बड़े इलेक्ट्रॉनिक चैनल कॉरपोरेट घरानों के हाथों में है l ठीक इसी तरह कुछ तथाकथित समाचार पत्रों समूह का भी हाल है l बड़े समूह बड़ी तेजी से बड़े हो रहे हैं, वही छोटे और मझोले हौले, हौले समाप्ति की ओर है l क्षेत्रीय और भाषाई समाचार पत्र  की सुध लेने वाली कोई सरकारें आज देश में नहीं बची है l इन मीडिया घरानों का संरक्षण देने के लिए कोई भी सरकारें आज तैयार नहीं है, कुछ  सरकुलेशन के नाम पर, तो कुछ टीआरपी और फेक न्यूज़ के नाम पर लगातार इन पर शिकंजा कस परेशान कर रही है l सोच यही कि छोटे और मझोले  घरानों पर इतने नियम कानून लाद दिए जाएं कि वे अपने आप पत्रकारिता की राह बदल ले ,पर उन्हें क्या मालूम पत्रकारिता ( मीडिया)  लघुु एवं मझोले के लिए एक पेशा नहीं देश और समाज की भक्ति  का एक जज्बा है l एक ओर मीडिया का दायित्व बोध तो सभी सरकारे कराती है,  पर उनके साथ न्याय करने में सभी सरकारें असफल या चूक कर बैठती है l ये शोध का विषय हो सकता है l आज के दौर में जहां परिवार चलाना कितना कठिन काम है , उसके बाद भी मीडिया के घरानों पर अपने घर, परिवार के साथ-साथ कर्मचारियों के घरों में भी चूल्हा किस तरीके से नियमित जले इस सोच के साथ वे आगे बढ़ रही हैं l देश को विकास के पथ पर किस तरीके से आगे ले जा सकते हैं  चाहे  सरकार की योजनाएं स्किल डेवलपमेंट का मामला हो  या फिर रोजगार के साधन उपलब्ध कराने से लेकर  समाज को  संदेश के साथ-साथ शिक्षा व सूचनाएं प्रदान करने का कार्य  निरंतर  और लगातार अपने दायित्व बोध को समझते हुए कर रही है l सभी के साथ न्याय की बात करने वाली सरकारें आज इस कोरोना वायरस के  विपदा  की घड़ी पर मीडिया के साथ खड़े क्यों नहीं है ? आज मीडिया के लिए क्यों नहीं सोचा जा रहा है ? आज मीडिया को लगातार कई भागों में बांटा जा चुका है l प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, वेब सहित सोशल मीडिया अपने आप को अकेला और ठगा हुआ महसूस कर रहा है l अब मीडिया को समय रहते एक होना होगा l  इसलिए मेरे मत से तो अब समय आ चुका है की मीडिया को भी इस कोरोना वायरस के महामारी से देश को बाहर  निकलने के तुरंत बाद जनता को साथ में लेकर लड़ाई लड़नी पड़ेगी, अब मीडिया की लड़ाई जनता के पाले में ही होना चाहिए l अब जनता से पूछा जाना चाहिए कि क्या सरकारें मीडिया के साथ न्याय कर रही है ?  जब यह सब राजनेता और सरकारें समय-समय पर जनता जनार्दन के सामने अपना घुटना टेकती नजर आती हैं , तो मुझे लगता है कि हमें भी जनता के बीच जाकर अपने लिए न्याय मांगना चाहिए,चाहे  मामला मीडिया वारियर को दिए जाने वाले पैकेज या बीमा  से संबंधित हो, या फिर जीएसटी सहित नित नए लगने वाले  कानूनों का, हमें जनता से पूछना होगा, कि क्या यह सरकारें मीडिया के साथ न्याय संगत व्यवहार कर रही हैं? मीडिया का फैसला जनता की अदालत में ही न्याय के लिए न्याय की खातिर हमें जाना उचित होगा l मीडिया के साथ न्याय की अपेक्षा लिए आपका साथी........... मलय  बनर्जी प्रदेश अध्यक्ष 
आल इंडिया स्मॉल एन्ड मेडियम न्यूज़ पेपर फेडरेशन 
महा सचिव छत्तीसगढ़ एडिटर्स एन्ड पब्लिशर एशोसिएशन (से पा )

 

 

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