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वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक श्री रुचिर गर्ग के फेसबुक वाल से प्रेस दिवस पर मित्र Pc Rath की एक पोस्ट पर मेरी टिप्पणी: ( पोस्ट का लिंक कमेंट बॉक्स में )

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वरिष्ठ पत्रकार एवं  सम्पादक श्री रुचिर गर्ग के फेसबुक वाल से
प्रेस दिवस पर मित्र Pc Rath  की एक पोस्ट पर मेरी टिप्पणी: ( पोस्ट का लिंक कमेंट बॉक्स में ) 

जब तक पत्रकार या उनके संगठन कथित चौथा स्तंभ होने के मिथ्या गौरव से उबरेंगे नहीं और खुद को समाज के अन्य वर्गों के संघर्षों से जोड़ेंगे नहीं तब तक उन्हें विशिष्ट  होने का कृपा भत्ता ही देश देता रहेगा।

ये चिंता बहुत व्यापक है।

मुझे याद है कि हमने किसी समय रायपुर में मई दिवस के जुलूस में शामिल होने का फैसला किया था,जाने लगे थे।यह साझेपन की न्यूनतम अभिव्यक्ति थी,लेकिन यह भी बंद हो गई।

किसी समय एक संतोष यह तो था कि पत्रकार अपने अखबार के जरिए समाज के वास्तविक मुद्दों का प्रहरी बना रहता था लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि आज हकीकत कितनी तकलीफदेह है।

इस देश में पत्रकारिता का स्तर लगातार गिर रहा है यह अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां बता रही हैं । इसका रिश्ता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले से है लेकिन पत्रकारों/पत्रकार संगठनों की लड़ाई इस मोर्चे पर बेहद कमज़ोर है बल्कि है ही नहीं !देश हिंदू मुसलमान में उलझा रहे तो जैसे महंगाई,बेरोजगारी के सवाल नहीं उठेंगे,जैसे जनता के विभिन्न तबकों के सवाल नहीं उठेंगे वैसे ही पत्रकारों के जायज सवाल भी कमज़ोर बने रहेंगे।बतौर पत्रकार निष्पक्षता ,तटस्थता जरूरी है पर बतौर पत्रकार संगठन तो समाज के संघर्षों से अलग थलग नहीं रहा जा सकता। संघर्ष साझा होंगे तो मुद्दे भी साझी ताकत के साथ सामने होंगे। मांगों के जायज होने पर कोई सवाल ही नहीं है ,लेकिन जो मांगें पत्रकारों की हैं वही या वैसी ही मांगें समाज के अन्य तबकों की भी हैं । हर तबका अपनी मांगों को लेकर अलग अलग लड़ाई लड़ता ही है लेकिन वो साझा संघर्षों का भी हिस्सा होता है। उनमें से अधिकांश महंगाई ,बेरोजगारी से लेकर अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र की बर्बादी तक के सवाल उठाते हैं ,उनका अपना स्टैंड होता है,लेकिन दुर्भाग्य से अपवादों को छोड़कर पत्रकार संगठन इस लड़ाई में मुखर नहीं हैं।संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी कथित चौथे स्तंभ पर भी तो है।अखबार या चैनल पर उनका स्टैंड अलग हो सकता है। यह उनकी स्वतंत्रता है पर पत्रकार संगठन खुद को संविधान बचाने की लड़ाई से अलग कैसे रख सकते हैं । रायपुर में Pc rath और उनके साथी ऐसी जगहों पर हमेशा होते हैं लेकिन ये रायपुर की लड़ाई नहीं है।पत्रकारों की जायज मांगों का रिश्ता पत्रकारिता पर हमले से है और मुनाफे से भी है । वस्तुतः लड़ाई एक पूरी व्यवस्था से है। इस चेतना के साथ लड़ाई जरूरी है ।छोटी मोटी मांगें पूरी होती रहेंगे लेकिन दशा फिर भी नहीं बदलेगी।

आज इस देश में संगठित क्षेत्र के कर्मचारी आंदोलन ने लड़ कर ही कर्मचारियों अधिकारियों के लिए बेहतर स्थिति,बेहतर आर्थिक,सामाजिक सुरक्षा हासिल की है।उन्हें इस लड़ाई में हर तबके का साथ था।बावजूद इन आरोपों के कि यह संगठन भी अपने आर्थिक सवालों पर ज्यादा केंद्रित रहे इन संगठनों ने देश के हर जरूरी सवाल पर हस्तक्षेप किया ,साथ खड़े रहे।अलग–थलग नहीं रहे। मुझे दशकों पहले रायपुर में अशासकीय शिक्षकों के एक आंदोलन की याद है ।इस आंदोलन के समर्थन में रायपुर के सफाई कामगारों का संगठन भी मैदान में आ गया था। बाद में शिक्षकों के आंदोलन की जीत भी हुई थी।यही राह पत्रकार संगठनों को भी चुननी ही होगी,स्पष्ट स्टैंड के साथ– यह अनुभवों के आधार पर मेरी अपनी राय है। इस पर मत भिन्नता हो सकती है। 

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