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हिंदी के महान कवि गजानंद माधव मुक्तिबोध की रचनाएं घर्षण से उपजी चिंगारियां

हिंदी के महान कवि गजानंद माधव मुक्तिबोध की रचनाएं घर्षण से उपजी चिंगारियां

IAS- श्री तारन प्रकाश सिन्हा  जी की फेसबुक वॉल से 

Gajanan Madhav Muktibodh(गजानन माधव मुक्तिबोध) | Kavishala Sootradhar

हिंदी के महान कवि गजानंद माधव 'मुक्तिबोध' की रचनाएं घर्षण से उपजी चिंगारियां हैं। इन चिंगारियों में आग भी है और रौशनी भी। जो आग है, वह भूख और बेबसी के खिलाफ मुक्तिबोध की पताका है। जो रौशनी है वह शोषण और साजिशों के खिलाफ मुक्ति की राह है। जिन संघर्षों से ये रचनाएं उपजीं हैं, वह मुक्तिबोध के भीतर-बाहर, सब ओर पसरा हुआ है। 

अपने इर्द-गिर्द पसरी विसंगतियों से संघर्ष से पहले वे अपने अंतःकरण से संघर्ष करते हैं, खुद को बाहर पसरे हुए संघर्ष के लिए मजबूत करते हैं। उन्हें सबसे बड़ा आत्माभियोगी कवि कहा जाता है। मुक्तिबोध के चाहने वालों के लिए यह उनका सबसे बड़ा संदेश भी है। वे जानते हैं सपनों के भीतर भी सपने होते हैं, विचारधाराओं के भीतर विचारधाराएं होती हैं, मतिष्क के भीतर एक मतिष्क होता है, उसके भी भीतर एक कक्ष, फिर गुप्त प्रकोष्ठ, फिर उस प्रकोष्ठ के अंधेरे में एक बंद संदूक।

 उस मजबूत संदूक में कोई बंद है, शायद यक्ष, या फिर ओरांग उटांग। डर यह कि वह कहीं छूट न जाए। दुनिया जान न ले कि असत्य शक्ति का प्रतिरूप वह औरांग-उटांग भीतर ही कहीं छुपा हुआ है।

मुक्तिबोध अपनी एक अन्य कविता 'ओ अप्रस्तुत श्रोता' में स्वयं को अंगारे की तरह परिभाषित करते हैं, जो किसी कारखाने की चिमनी से निकलते स्याह धुंए के साथ निकल भागा है।  
ओ, अप्रस्तुत श्रोता,
ओ अनुपस्थित पाठक,
मैं अंधेर-कारखाने के
स्याह धुंए के बहाव में से निकल भागते
अंगारे-सा
उड़-तिरकर चुपचाप तुम्हारी छत पर
चोरी-चोरी आ पहुंचा हूँ;
पर जलाउंगा नहीं तुम्हें
मैं अपनी कविताओं से।
मैंने चोरी-चोरी भीतर का रेडियम संभाल रखा है।
आज अकेले उसी एक कोने में तुमको पाने,
ले जाने के लिए
तुम्हारे घर आया हूँ
ओ मेरे प्रिय पात्र!  
हम सभी के लिए यह गर्व की बात है कि हिंदी के ऐसे महान कवि ने अपनी कर्मभूमि छत्तीसगढ़ की साहित्य परंपरा को ऐसी समृद्धि दी, जिसका कभी क्षरण नहीं होगा। 
आज उनकी पुण्यतिथि है। उन्हें शत-शत नमन।

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