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कैसे खत्म हुए थे कैनेडा के छोटे किसान

कैसे खत्म हुए थे कैनेडा के छोटे किसान

रविन्द्र सिंह ढुल के कलम से                            

भारत में बने किसान विरोधी कानून को लेकर आंदोलन जोरो पर है । सरकारी मशीनरी इन किसानों को देशद्रोही तक साबित करने में जुटे है । बहुत लोग इस कानून की वाहवाही कर रहे मगर ऐसा ही एक कानून कैनेडा में भी आया था जिसने देश के छोटे किसानों को खत्म कर दिया , फिर या तो वो किसान अपने खेतों में कम्पनी के मजदूरी करते है या शहरों की फैक्ट्री में काम ।

      कैनेडा दुनिया के कभी गेहूँ के सबसे बड़े उत्पादकों में रहा है , कैनेडा वीट बोर्ड कैनडा की गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य तैय करता था । कैनेडा सरकार ने निजी खुली मंडी को छूट देने के लिए C-18 नामक कानून 1912 के करीब लागू कर दिया। इस से समर्थन मूल्य की अहमियत ना के बराबर हो गई और वीट बोर्ड में एक निजी कम्पनी की हिस्सेदारी 50 फीसदी से ज्यादा हो गई। इससे सब कुछ बदल गया , गिरते दाम में किसान बर्बाद होने लगा । बहुत सारे किसान अपनी जमीनें सस्ती कम्पनी को बेच गये मगर कम्पनी ने उनके औजार नही खरीदे , फलस्वरूप सारी मशीनरी खड़ी खड़ी कबाड़ बन गई ।

   एक आंकड़े के मुताबिक कैनेडा में 1991 से 2019 तक 3 करोड़ 90 लाख  करीब से घट कर 29000  के करीब ही किसान बचे है जबकि खेती वाली जमीन बढ़ गई। अब खेतो पर कम्पनियों का कब्ज़ा और कभी जिनके पूर्वज जिन खेतो के मालिक रहे थे उन खेतो में वो मजदूरी करते , ट्रक्टर , कम्बाईन चलाते फिर रहे है । कम्पनीयो ने फ़ूड सेफ्टी के नाम पर ऐसे कानून बनवा दिए है कि कोई किसान अपनी गाय का ताज दूध निकाल कर नही बेच पाता । आपको किसी गली में आटा , मसाला पीसने वाली चक्की नही मिलेंगे , सब कम्पनी के स्टोर से मिलेगा । लोगो को बढ़िया गाड़ी और दूसरी सुविधा देकर सारी उम्र हर रोज काम करने और सारी उम्र लोन की किश्त भरने का आदी बना दिया। जो जमीनों के राजे थे आज मजदूर हो गए ।

हम किसान इसी लिये इस बिल का विरोध कर रहे है  कही हमारे वंशज भी अपने खेतों में मजदूर ना बन जाए ।

जानकारी का स्त्रोत एक मित्र ।

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