बस्तर

नक्सलियों से निपटने दीर्घ रणनीति की जरूरत

नक्सलियों से निपटने दीर्घ रणनीति की जरूरत

सुधीर जैन की रिपोर्ट 

जगदलपुर : छत्तीसगढ़ में आतंक का पर्याय बने नक्सलवाद पर काबू पाने के लिये लंबी रणनीति बनाये जाने की ज़रुरत है। इतिहास गवाह है कि किसी इलाके से अगर माओवादी थोड़े समय के हट भी जायें तो, यह उनकी रणनीति का ही हिस्सा होता है। वे दुबारा उसी इलाके में पूरी तैयारी और रणनीति के साथ लौटते हैं। वे इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं हैं, उनके निपटने के लिये दीर्घकालीन रणनीति बनाने जाए जाने की महती आवश्यकता है। दरअसल माओवादियों को जिस तरीके का प्रशिक्षण दिया जाता है, वह सेना के प्रशिक्षण की तरह है, लेकिन हमारी सीआरपीएफ जैसी फोर्स को लडऩे के लिये तो प्रशिक्षित किया जाता है, लेकिन माओवादियों से लडऩे का प्रशिक्षण उन्हें भी नहीं दिया जाता, उन्हें गुरिल्लावार से विशेष तौर पर प्रशिक्षित करने की ज़रुरत है।

यहां उल्लेख करना लाजिमी होगा कि माओवादियों को इस तरह की लड़ाई में स्ट्रैटज़ी और टैक्टिस का पूरा प्रशिक्षण होता है, वे देश के किसी भी हिस्से में हुये पुलिस मुठभेड़ का पूरी गहराई के साथ विश्लेषण करते हैं, उस पर अपने साथियों से चर्चा करते हैं और फिर उसके सकारात्मक-नकारात्मक पहलू पर विचार करते हुये अपनी अगली रणनीति तय करते हैं, जबकि पुलिस में इसका नितांत अभाव है। समय की जरूरत है कि माओवादियों से लडऩे की रणनीति बने, उनके हमलों को लेकर प्रशिक्षण दिया जाये तभी कारगर ऑपरेशन किये जा सकते हैं।

बस्तर में सेना को तैनात करने की ज़रुरत नहीं है, ऐसा नहीं है कि बस्तर के सारे आदिवासी माओवादी हैं। दरअसल जो लड़ाई पुलिस लड़ सकती है, उसके बजाये सेना को उस लड़ाई में शामिल करना कोई बेहतर रणनीति नहीं होगी।

उल्लेखनीय है कि माओवादी अपनी लड़ाई को हमेशा दीर्घकालीन युद्ध कहते हैं। उनके दस्तावेज़ बताते हैं कि वे दीर्घकालीन लड़ाई में पीछे हटने को एक सामान्य प्रक्रिया मानते हैं। यह संभव है कि माओवादियों को सरकार ने बैकफूट पर डाल दिया हो, लेकिन इसका मतलब यह कभी नहीं लगाया जाना चाहिये कि ऐसा करने से माओवादी हार मान लेंगे। उनका विश्वास है कि आगे-पीछे आने-जाने की प्रक्रिया में भी अंतत: वे अपनी लड़ाई में जीत हासिल ज़रुर करेंगे। जब भी माओवादी बैकफूट पर जाते हैं, तो उस अवसर का उपयोग अपनी गल्तियों, कमजोरियों को समझने, उसमें फेरबदल करने और आगे की लड़ाई की तैयारी में लगाते हैं। वे इतनी आसानी से चुप बैठने वाले नहीं हैं। माओवादियों के खिलाफ अगर कारगर लड़ाई लडऩा है, तो सरकार को दीर्घ कालीन रणनीति बनानी ही होगी।

नक्सलवाद के खात्मे के लिए ठोस और नीतिगत निर्णय लेना होगा। सुरक्षा और खुफिया तंत्र को नक्सलियों के मुकाबले अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाना होगा। इसके अलावा स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना होगा। हमें यह समझना होगा कि सुरक्षा में जरा सी लापरवाही हमारे लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। 

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