दुर्ग

आज इस ग्रीष्मकालीन ज्ञानवर्धक शिविर का 12वां वर्ष है जिसका आज उद्घाटन सु.श्री मानिन्य सरोज पांडेय जी के द्वारा हुआ।

आज इस ग्रीष्मकालीन ज्ञानवर्धक शिविर का 12वां वर्ष है जिसका आज उद्घाटन सु.श्री मानिन्य सरोज पांडेय जी के द्वारा हुआ।

GCN

दुर्ग : विद्या विनय विनम्रता देती है , विनय से पात्रता योग्यता आती है , पात्रता से धन आता है , धन से धार्मिक कार्य और सुरव प्राप्त होता है । यदि आप भी सुरव , शांति और आनंद चाहते हैं तो ज्ञान प्राप्त करें । सनातन जगत में शिक्षा का महत्व अनादिकाल से है शिक्षा को अमृत्व का साधन माना गया है । प्राचीन काल में आज की तरह बड़े स्कूल कालेज संस्थान नही थे फिर भी लोग शिक्षा के लिए गुरुकुल में या धार्मिक स्थानों पर जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे । शास्त्रों में बताया गया है कि विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे जिसके द्वारा हम रोग शोक , द्वेष , पाप , दीनता , दास्ता , गरीबी , बेकारी , अज्ञान , अभाव , दुर्गुण , कुसंस्कार , आदि की दास्ता से मुक्ति प्राप्त कर सकें वह विद्या है , ऐसे विद्या को प्राप्त करने वाले विद्वान कहे जाते है । आज के संदर्भ में बात करें तो स्कूल कालेजो में मार्कशीट में केवल मार्क्स लाने के लिए पढ़ाई कराई जाती है पर व्यवहारिक ज्ञान संस्कार एवं नैतिकता , आदि विषयों में बहुत ही कम ध्यान दिया जाता है । आज के व्यावसायिक एवं प्रतिस्पर्धा के युग में अपने व्यक्तित्व के चहुमुवी विकास के लिए विभिन्न क्षेत्रों का ज्ञान होना आवश्यक हो गया है साथ ही उससे भी ज्यादा आज के परिवेश में संस्कारों को बचाना भी जरूरी हो गया है । जिसके लिए पूज्य शदाणी दरबार हर वर्ष ज्ञानवर्धक शिविर का आयोजन करती है । जिसमें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वो अपने भीतर सदैव आत्मविश्वास को बनाए रखें अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके साथ ही मानवता आध्यात्म को भी अपने जीवन में उतार सकें।

जीवन में धार्मिक शिक्षा का विशेष महत्व है साथ ही जीवन में नैतिक और भौतिक नियंत्रण भी जरूरी है और राष्ट्र भावना भी । यही हमारी भारतीय संस्कृति है सनातन धर्म में संस्कारों का विशेष महत्व है । इनका उद्देश्य शरीर , मन , और मष्तिस्क करना है जिससे मनुष्य समाज में अपनी भूमिका आदर्श रूप में निभा सकें । संस्कार का अर्थ होता परिमार्जन शुद्धिकरण हमारे कार्य व्यवहार आचरण के पीछे हमारे संस्कार ही होते है । ये संस्कार हमें समाज का पूर्ण सदस्य बनाते हैं । शुद्धता , पवित्रता , धार्मिकता एवं आस्तिक्ता संसार की प्रमुख विशेषताएं हैं । ऐसी मान्यता है कि मनुष्ट संस्कारों के माध्यम से वह सुसंस्कृत हो जाता है संस्कार व्याक्ति के जीवन में आने वाली बाधाओं का भी निवारण करते हैं तथा उनकी प्रगति के मार्ग को निष्कंटक बनाते हैं । इसके माध्यम से मनुष्य आध्यात्मिक विकास भी करता है इन्हीं अच्छे संस्कारों को पुष्ट करने के लिए ही पूज्य संतो द्वारा शदाणी दरबार में हर वर्ष विद्यार्थी संस्कार शिविर एवं व्यक्तित्व विकास शिविर का आयोजन किया जाता है।

More Photo

    Record Not Found!


More Video

    Record Not Found!


Related Post

Leave a Comments

Name

Contact No.

Email