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विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस: समय पर परिवार ने समझी परेशानी, बच गई जान

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस:  समय पर परिवार ने समझी परेशानी, बच गई जान

TNIS

मानसिक अस्वस्थता पर विजय पाकर दे रहीं औरों को हौसला

महासमुंद: सविता सिंह और पुष्पा (परिवर्तित नाम) आज सामान्य और खुशहाल जीवन जी रही हैं। सविता जहां अपनी पढ़ाई जारी रखी हैं तो वहीं पुष्पा भी अपने परिवार में खुशियां बिखेर रही हैं। इतना ही नहीं सविता पहले की तरह अब कॉलेज की विभिन्न गतिविधियों में भी हिस्सा लेकर कॉलेज सहपाठियों की चहेती हैं और समुदाय को मानसिक स्वास्थ्य , तनाव और अवसाद के प्रति जागरूक भी कर रहीं हैं। दोनों में जीने की ललक उनके परिवार और साथी के प्रयास से संभव हुआ है ।

समय पर सविता और पुष्पा की मानसिक स्थिति और व्यवहार में बदलाव का आंकलन आसपास के लोग नहीं कर पाते, तो शायद दोनों ही अपने जीवन का अंत कर लेतीं।

इन्होंने त्यागा नकारात्मक विचार-

मनोचिकित्सक डॉ. सुचिता ने बताया दो माह पहले ग्रामीण इलाके की 22 वर्षीय सविता जब उनके पास आई तो एकदम शांत, चेहरे पर उदासी, मायूसी, चिंता और शारीरिक दुर्बलता के साथ आत्महत्या का करने पर उतारू थी। डॉ. सुचिता गोयल के मुताबिक वह हमेशा नाराश और बुझी-बुझी सी रहती थी। पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लगता था और आत्महत्या का विचार कई बार उसके मन में आता था। लेकिन परिवार के लोगों ने उसकी इस मनोदशा को समझा और समय रहते उन्हें चिकित्सकीय परामर्श के लिए उनके पास लेकर आई। इसके बाद उनकी और उनके परिवार की काउंसिलिंग हुई और आज ना सिर्फ सविता ने आत्महत्या को गलत माना है बल्कि अपनी पढ़ाई पूरी कर औरों के मन में इस तरह उठ रही भावनाओें को दूर करने के प्रयास में जुटी हैं।

 महासमुंद की रहने वाली 45 वर्षीय पुष्पा छह वर्षों से अवसाद और तनाव में थीं। उनके मन में निराशा, हीन भावना ने घर कर रखा था। इसलिए अक्सर उन्हें आत्महत्या करने का विचार आता था। एक दिन उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया Iसमय पर अस्पताल पहुंचने की वजह से उन्हें उनका जीवन वापस मिल गया। परंतु उन्हें जीवित रहने का अफसोस था। मनोचिकित्सक ने उनकी और उनके परिवार की काउंसिलिंग की और जरूरी दवाएं भी दी, आज वह खुशहाल जीवन जी रही हैं।

मामूली मदद किसी की बचा सकती है जान -

मनोचिकित्सक डॉ. सुचिता कहती हैं “हमारे आस-पास कोई ऐसा व्यक्ति (महिला या पुरुष) है, जिसका व्यवहार पहले की अपेक्षा असामान्य सा हो रहा है तो उस वक्त ही उसकी परेशानी समझनी चाहिए। ऐसा करने से उस व्यक्ति के मन में आ रहे आत्महत्या के विचार को खत्म कर, जीने की आस जगाई जा सकती है।“ डॉ. गोयल के अनुसार कुछ परिस्थियां होती हैं जिसे देखकर व्यक्ति की मनोदशा को पहचाना जा सकता है। जैसे- लोगों के व्यवहार में बदलाव आना, नकारात्मक सोच रखना, जीवन के प्रति निराश होना, चिड़चिड़ाना, गुमसुम रहना, मिलने-जुलने से कतराना आदि। ऐसे व्यवहार वाले लोगों की उपेक्षा नहीं करें, उनकी बात को सुनें और किसी मनोचिकित्सक से फौरन उसे परामर्श करने की सलाह दे। हो सके तो उन्हें लेकर जाएं।

मुख्य कारण-

मनोचिकित्सक के अनुसार आत्महत्या का विचार आने का मुख्य कारण निराशा और मानसिक तनाव है। इसके अलावा अवसाद, चिंता, मादक द्रव्यों का सेवन, सिज़ोफ्रेनिया, जीवन में कई विफलताएं हो सकती हैं जैसे -उपेक्षा, अनउपलब्धियां, रिश्ते आदि। अधिकांश लोग ऐसे घातक विचारों के बारे में अपने परिवार, दोस्तों से इसकी चर्चा नहीं करते हैं और मनोचिकित्सकीय परामर्श भी नहीं लेते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर चल रहे कई कार्यक्रम-

राष्ट्रीय अपराध  रिकॉर्ड ब्यूरो (एन सी आर बी) 2019 के आंकड़ों के अनुसार 26.4 प्रति 100,000 व्यक्ति की दर के साथ छत्तीसगढ़ देश में सर्वाधिक आत्महत्या की दरों वाले राज्यों में से एक है। इनको ध्यान में रख, तनाव प्रबंधन और लोगों की मदद करने मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं। महासमुंद  में प्रशासन की पहल पर `नवजीवन 'का शुभारंभ किया गया। तनाव आत्म-क्षति का एक प्रमुख कारण या ट्रिगर है इस भावना के मद्देनजर जिला मुख्यालय से गांवों तक मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता पैदा करने कि मुहीम छेड़ी गई है। आत्महत्या की रोकथाम और तनाव प्रबंधन के अलावा, जीवन कौशल के लिए प्रशिक्षण, विशेषज्ञों द्वारा मुफ्त परामर्श और मानसिक विकारों वाले लोगों की पहचान करने जैसी गतिविधियां भी की जा रही हैं।

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