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गरीब परिवारों के बच्चों को भी मिलना चाहिए उनके जीवन जीने का मौलिक अधिकार :सज्जाद खांन

गरीब परिवारों के बच्चों को भी मिलना चाहिए उनके जीवन जीने का मौलिक अधिकार :सज्जाद खांन

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गरीब परिवारों के बच्चों को भी मिलना चाहिए उनके जीवन जीने का मौलिक अधिकार मुफ्त शिक्षा स्वास्थ्य सिर छिपाने के लिए पुनर्वास कि व्यवस्था हो सज्जाद खांन कि कलम से

रायपुर : अवाम ए हिन्द सोशल वेलफेयर कमेटी के तत्वावधान में किये जा रहे निरतंर 3 माह से बेघर बेबसों जरूरत मंदो असहाय लाचार गरीब निर्धन  परिवार के बुजुर्गों महिलाओं अनाथ बच्चों के लिए फुटफाथ पर जिंदगी बसर करनेवाले लोगों की भोजन एवं निशुःक चिकित्सा व्यवस्था करने के उपरांत मे असहाय निर्धन परिवार के वा उनके बच्चों  का  प्रदेश में दैनिक स्थिति है। यह बच्चे आखिर कहाँ से आते है। इनके मांँ बाप कौन है। जिन हाथों में शिक्षा के पाठ्य सामग्री होनी चाहिये थी लेकिन यह बच्चे तास के पत्ते और खतरनाक सुलेशन नशेखोरी के आदी हो गए हैं। यदि समय रहते हुए इन गरीब परिवार के बच्चों के समूचित व्यवस्था नहीं की गई तो आने वाले समय में यहीं बच्चे हिंसात्मक बन जाते है। समाज कल्याण विभाग एवं व्यवस्थाओं के जिम्मेदार लोगों को इनकी सही समय पर सुध लेने की समय कल्याण विभाग एवं शासकीय योजनाओं के लाभ उठाने वा भारीभरकम अनुदान प्राप्त करनेवाले वाले एंजियो को यह मानवीय संवेदना पर भी ध्यान रखने की    आवश्यकता है। स्ट्रीट चिल्ड्रेन एक ऐसा शब्द है जो शहर की सड़कों पर रहने वाले बच्चों लिए प्रयोग होता है वह परिवार की देख भाल और संरक्षण से वचिंत हैं।सडकों में रहनेवाले ज्यादा तर बच्चे 5-17 वर्षों के हैं। और इनकी जनसंख्या देश के सभी शहरों में भिन्न भिन्न है। स्ट्रीट चिल्ड्रेन को परिभाषित करने के लिए बहुत कुछ लिखा जा चुका हैं,उनका कुछ सही सही वर्ग नहीं है, कुछ लोग सडकों मे ही जीवन यापन करते हैं और कुछ लोग दिन के समय सडकों में तथा रात को कुछ व्यस्क विक्षिप्त लोगों के साथ व्यतित करते हैं।

  संस्था अवाम ए हिन्द सोशल वेलफेयर कमेटी के संस्थपाक मोहम्मद सज्जाद खान जी ने संस्था द्वारा कराए गए कर्यो के दरमियान इन स्ट्रीट चिल्ड्रेन के बीच अपना कुछ वक्त बीताया,उनका कहना है इसका मुख्य कारण गरीबी ही है।उन्होंने गरीबी को अपने अल्फाजों में कुछ इस तरह परिभाषित किया-गरीबी वह स्थिति है जिसमें एक इन्सान के पास जीवन जीने के बुनियादी साधनों एवं धन का आभाव निरन्तर बना रहता है।एक गरीब होने का मतलब दो वक्त की रोटी, पेट भर खाना नसीब नहीं होना, सिर छुपाने के लिए घर न होना, पैसो की किल्लत की वजह से बीमार होने पर अस्पताल में बेहतर इलाज न करा पाना , कई महीनों तक सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटते रहना है। वहीं, एक गरीब से जब हमने पूछा कि उसके लिए गरीब होने का मतलब क्या है, तो उसने बस एक शब्द कहा और वह शब्द है ‘दुर्भाग्य’। वहीं, कई मंदिरों के दर पर भीख मांगने वालों ने गरीबी को ही अपनी तकदीर मान लिया है।सरकारें आईं और गईं, लेकिन इस गरीबी नामक समस्या का कोई इलाज नहीं हो सका। गरीबी देश के लिए एक ऐसी समस्या बनकर खड़ी हुई है, जो देश के आर्थिक विकास में बाधक है। गरीबी एक ऐसी बीमारी है, जिससे अपराध, अशिक्षा, जैसी कई समस्याएं जुड़ी हैं। देश में कई लोग आपको फुटपाथों पर भीख मांगकर, सड़कों पर ही जिंदगी गुजर-बसर करते नजर आएंगे। इन गरीब लोगों के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते।

वह अगर पढ़ना भी चाहें, तो गरीबी ही है जो उन्हें पढ़ने नहीं देती। एक साल, दो साल पढ़ने के बाद, वे स्कूल छोड़ देते है। परिवार वाले बच्चों को पढ़ा नहीं पाते बच्चे पढ़ना भी चाहें तो पेट की खातिर पैसे जुटाने की चाह, उन्हें पढ़ने से दूर कर देती *है। इस तरह गरीबी का यह ‘दुष्चक्र’ चलता रहता है।सरकारके साथ साथ सभ्य समाज की भी यह जिम्मेदारी बनती हैं कि मानवीय मूल्यों के आधार पर इनकी समूचित व्यवस्था करने के लिए आगे बढ़ें .

संस्थापक मों सज्जाद खांन कि कलम से

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