विशेष रिपोर्ट

हिंदू कानूनों के तहत आदिवासी केसों की सुनवाई पर रोक लगाने की हाई कोर्ट से मांग...

हिंदू कानूनों के तहत आदिवासी केसों की सुनवाई पर रोक लगाने की हाई कोर्ट से मांग...

प्रो. अनिरुद्ध सुधांशु​

राजस्थान : आदिवासी मीना पंच पटेल महापंचायत के स्थानीय सक्रिय कार्यकर्ता आर.डी.मीना "बागड़ी" ने बताया है कि आदिवासी मीना पंच पटेल महापंचायत के संयोजक आदिवासी ताऊ डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीना ने राजस्थान हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मांग की है कि अजजा में शामिल आदिवासी समुदायों के मामलों को पारिवारिक अदालतों द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (2) के प्रावधानों के विपरीत सुनवाई हेतु स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगाया जावे।

आदिवासी ताऊ डॉ. मीना ने पत्र में लिखा है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (1) में साफ शब्दों में प्रावधान किया गया है कि हिंदू विवाह अधिनियम केवल हिंदुओं पर लागू होगा। इसी प्रकार से हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (2) में साफ शब्दों में प्रावधान किया गया है कि हिंदू विवाह अधिनियम, संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (25) के तहत अजजा में शामिल समुदायों पर लागू नहीं होगा। इन प्रावधानों के होते हुए और इन प्रावधानों की अनदेखी करते हुए अजजा में शामिल समुदायों के लोगों के वैवाहिक विवादों से सम्बन्धित मामले राजस्थान की अधिनस्थ अदालतों/पारिवारिक अदालतों द्वारा विचारण हेतु लगातार स्वीकार किये जा रहे हैं। जबकि अधिनस्थ अदालतों को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत अजजा वर्ग में शामिल समुदायों के लोगों के वैवाहिक विवादों को सुनने की अधिकारिता ही नहीं है।

श्री बागड़ी ने बताया कि आदिवासी ताऊ डॉ. मीना ने पत्र में आगे चीफ जज को लिखा है कि उपरोक्तानुसार अधिकारिता न होते हुए अनाधिकृत रूप से अजजा समुदायों के मामलों को स्थानीय अदालतों द्वारा विचारण हेतु स्वीकार कर लिये जाते हैं। कुछ अदालतों द्वारा अधिकारिता न होते हुए ऐसे मामलों में निर्णय भी सुना दिये जाते हैं। यद्यपि राजस्थान हाई कोर्ट के अनेक निर्णयों तथा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2 (2) के प्रावधानों के अनुसार ऐसे मामले/निर्णय निरस्त होकर कानून की दृष्टि में शून्य घोषित कर दिये जाते हैं। अंततः ऐसे मामलों के निस्तारण अजजा में शामिल आदिवासी समुदाय की रूढिगत पंच-पटेल-पंचायतों द्वारा ही निस्तारित किये जाते हैं।

आदिवासी ताऊ डॉ. मीना ने अपने पत्र में मुख्य न्यायाधीश का ध्यान आकर्षित करते हुए आगे लिखा है माननीय यहां सबसे दुःखद पहलु यह है कि कानूनी पहलुओं की बारीकियों से अनभिज्ञ अजजा वर्ग में शामिल समुदायों के भोले भाले लोगों के वैवाहिक विवादों के मामलों को स्थानीय न्यायालयों/पारिवारिक अदालतों द्वारा विचारण हेतु स्वीकार कर लेने से पक्षकारों के जीवन के बहुत से अमूल्य वर्ष न्याय की प्रतीक्षा में बर्बाद हो जाते हैं।

पत्र के अंत में आदिवासी ताऊ डॉ. मीना ने अपने पत्र में मुख्य न्यायाधीश को सानुरोध आग्रह करते हुए लिखा है कि कृपया राजस्थान की सभी स्थानीय अदालतों और पारिवारिक अदालतों को आपकी ओर से अजजा समुदायों के हितार्थ साफ निर्देश जारी करने का कष्ट करें कि अधिनस्थ अदालतें अजजा वर्ग में शामिल आदिवासी समुदायों के वैवाहिक मामलों के विवादों को विचारण हेतु स्वीकार ही नहीं करें। जिससे पीड़ित आदिवासी पक्षकारों का न्याय की प्रतीक्षा में अकारण श्रम, समय और धन बर्बाद होने से बच सके। इससे न्यायपालिका पर भी अनावश्यक मुकदमों का कार्यभार भी कम होगा। 

श्री बागड़ी ने बताया कि लगभग सभी क्षेत्रों में मीना समुदाय के लोगों को कानून की बारीकियों का ज्ञान नहीं होने के कारण वे कोर्ट की शरण लेते हैं। जब​कि मीना समुदाय में हमेशा से रूढिगत पंचायतों में ही वैवाहिक विवादों का निर्णय होता रहा है। इस बारे में हाई कोर्ट की ओर से निचली अदालतों को निर्देश जारी हो जायेंगे तो मीना समुदाय के लोगों को कोर्ट में भटकने के जरूरत नहीं होगी।

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