विशेष रिपोर्ट

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (रेशमी रूमाल) के एक महान नेता मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (रेशमी रूमाल) के एक महान नेता मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी

मोहम्मद मियां मंसूर अंसारी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक महान नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता थे। वह 1868 में दारुल उलूम देवबंद के संस्थापकों में से एक, मोहम्मद कासिम नानोत्वी के पोते थे। महमूद अल हसन देवबंदी के साथ, वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ रेशमी रूमाल आंदोलन के अग्रदूतों में से एक थे।

              मोहम्मद मियां मंसूर अंसारी का जन्म 10 मार्च, 1884 को सहारनपुर के एक अंसारी परिवार में हुआ था। उनका लालन-पालन अब्दुल्ला अंसारी के घर में हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, वह देवबंद मकतबा-ए-फिक्र के नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने भारत में पैन-इस्लामिक आंदोलन के लिए केंद्रीय शक्तियों का समर्थन लेने के लिए अल हसन देवबंदी देवबंदी के नेतृत्व में भारत छोड़ दिया, जिन्हें सिल्क लेटर आंदोलन के रूप में जाना जाता है। 
              रेशम रूमाल आंदोलनः-ये रेशम के कपड़े पर लिखे गए थे, इसलिए ये नाम रखा गया। सिल्क लेटर मूवमेंट के नायक मौलाना मोहम्मद मियां मंसूर अंसारी, जो सितंबर 1915 में मौलाना महमूद अल हसन के साथ हिजाज़, उस्मानिया साम्राज्य गए और पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में काम किया। वह अप्रैल 1916 में गालिब नामा (रेशमी पत्र) के साथ भारत वापस आए, जिसे उन्होंने भारत और आत्म निर्भर (स्वायत्त) क्षेत्र में स्वतंत्रता पसन्दों को दिखाया और फिर जून 1916 में उसे काबुल, अफगानिस्तान ले गए।

              मंसूर अंसारी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगान अमीर हबीबुल्लाह खान की एक रैली के लिए काबुल गए थे। उन्होंने दिसंबर 1915 में काबुल में स्थापित भारत की अनंतिम सरकार में शामिल रहे (सेवा की) और युद्ध के अंत तक अफगानिस्तान में रहे। उन्होंने रूस की यात्रा की और कई अन्य देशों से गुजरते हुए तुर्की में दो साल बिताए।

              वह मुस्लिम धार्मिक और राजनीतिक रहनुमाओं (नेताओं) के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन संगठन के सबसे सक्रिय और प्रमुख सदस्यों में से एक थे, जो मूल रूप से दारुल उलूम देवबंद से थे।
              1946 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उन्हें भारत लौटने के लिए कहा, और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दे दी। इस तरह उन्होंने सारी जिन्दगी भारत की स्वतंत्रता के लिए चलने वाले आंदोलन रेशमी रूमाल के साथ जुड़े रहे। और 11 जनवरी 1946 को इस दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गए। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिन्होंने अपनी सारी जिन्दगी देश को आजाद कराने के लिए कुर्बान कर दी, आज उनको कम ही लोग जानते हैं। आज उनको याद करने/कराने की जरूरत है। और उनकी याद में उनकी गौरवमयी उनके नाम पर संस्था की स्थापना करने की आवश्यकता है। जो भारत की एकता की मिसाल बन सके।

बे-नजीर अंसार एजुकेशनल एण्ड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी
उसिया रिसॉर्ट (क्वीन्स होम) कोह-ए-फिजा, अहमदाबाद पैलेस रोड, भोपाल-462001 (म-प्र)
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