विशेष रिपोर्ट

राष्ट्र और समाज के विकास की गति को तेज करने, स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र स्थापित कर प्रजातंत्र में जनप्रतिनिधियों के निष्पक्ष निर्वाचन की पद्धति अपनाई गई

राष्ट्र और समाज के विकास की गति को तेज करने, स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र स्थापित कर प्रजातंत्र में जनप्रतिनिधियों के निष्पक्ष निर्वाचन की पद्धति अपनाई गई

त्रिभुवन सिंह -जन अधिकार परिषद छत्तीसगढ़

राष्ट्र और समाज के विकास की गति को तेज करने, स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र स्थापित कर प्रजातंत्र में जनप्रतिनिधियों के निष्पक्ष निर्वाचन की पद्धति अपनाई गई, गांव गांव में राजनीतिक जागरूकता के साथ राष्ट्र और राज्यों के चुनाव में मताधिकार का प्रयोग सभी ने खुलकर किया, इस उम्मीद से कि आम नागरिकों का प्रतिनिधित्व कर आम जनजीवन के बेहतरी के लिए कार्य होगा, दिन दूनी रात चौगुनी विकास की गंगा बहेगी । लेकिन ऐसा उस हद तक नहीं हो रहा है ,निर्वाचन के बाद तत्काल निगम ,आयोग में मंत्रियों का दर्जा प्राप्त करने की होड़ लग गई, मंत्रिमंडल में शामिल होने के साथ ही साथ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनना तो राजनैतिक आकांक्षा अभिलाषा की पराकाष्ठा बन गई। 

प्रधानमंत्री बने तो ठीक लेकिन राष्ट्र के महत्वपूर्ण संसाधनों को निजी हाँथो सौंप रहे नीलाम कर रहे हैं जो राष्ट्र हित में नहीं ,राज्यों के मुख्यमंत्री बने कुछ मंत्री बने तो ठीक लेकिन पद पाने की होड़ तो कई  आयोग, निगम ,मंडल में मंत्री का दर्जा प्राप्त कर लिया यही उनकी उपलब्धि, लेकिन पद की गरिमा और कर्तव्य, दायित्व को सब भूल गए। 

कई राज्यों में कुछ लोगों की  महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ी की मुख्य मंत्री की कुर्सी के लिए राज्य सरकार के अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया। जनप्रतिनिधियों की इसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ने मध्यप्रदेश,कर्नाटक पंजाब में जनमत का अपमान किया ,राज्यों को अस्थिरता के कूचक्र में ढकेल दिया,अब यही महत्वाकांक्षा राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारों को अस्थिर करने में लगी है।

भारी जनमत से चुनी हुई सरकार के अस्थिर होने जैसा खामियाजा राज्य की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है शासन और प्रशासन की तमाम विकासात्मक गतिविधियां, कार्य योजनाएं लंबित हो रही हैं, प्रशासनिक अधिकारी भ्रम में हैं तो चुने हुए जनप्रतिनिधि उहापोह की स्थिति में, जनहित के मुद्दों को ताख में रख लोग अतिमहत्वाकांक्षी नेताओं की स्वार्थपूर्ति के लिए खेमेबंदी कर रहे हैं। 

ऐसा लगता है लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन की पद्धति क्या मात्र प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री बनाने की दौड़ तक ही सीमित है । क्या आम नागरिकों की बेहतरी की जिम्मेदारी उनकी नहीं है  ? 

अब तो आम नागरिक राजनैतिक कुर्सी की दौड़ के इस खेल को मूक बधिर की तरह देख रहा है और आम नागरिक हाई कमान के निर्देशों का इंतजार धृतराष्ट्र की तरह कर रहा है। राजनैतिक अस्थिरता नेताओं के नासमझी,और निर्णय ना ले पाने के कारण उत्पन्न होती है और यदि नेतृत्व में यह क्षमता नहीं है कि वह राजनीतिक सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक संकटों का समाधान कर सके तो उसे नेतृत्व की जिम्मेदारी ही नहीं लेनी चाहिए।
 
  स्वार्थ परक राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति मात्र से क्या राष्ट्र और राज्य का भला होगा क्या आम मतदाताओं ,आम जनता के साथ धोखा नहीं, सरकार को अस्थिर करने वाले सभी जनप्रतिनिधियों से अनुरोध है कि अपने कर्तव्य और दायित्व का पालन आम नागरिकों और आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के हित में करें अन्यथा नैतिकता तो यही कहती है कि अपने अपने पदों से त्यागपत्र दे देवें। 

निराश और हताश जनमत , राजनैतिक अस्थिरता के कारण उत्पन्न गंभीर समस्याओं से त्रस्त प्रताड़ित और शोषित महसूस करते हुए अपने आप को ठगा हुआ,छला हुआ पा रहा है।

जय हिन्द

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