विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ में नारी उत्थान...

छत्तीसगढ़ में नारी उत्थान...

लेखक-  श्री नरेन्द्र भारती

(सतनाम धर्म आंदोलन 1820-1830AD)
परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा के द्वारा नारी उत्थान के लिए चुड़ी प्रथा का संबोधन और सति प्रथा और विधवा क्रय प्रथा तथा बहु पत्नी प्रथा का निर्मुलन :-

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१८वी सदी में जननायक गुरु घासीदास बाबा ने महिला सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा किया। इसके लिए उन्होंने सति प्रथा , विधवा क्रय प्रथा, और बहूपत्नि प्रथा का विरोध किया।

तात्कालिक समय में स्त्री समाज अत्यंत पीड़ित और अत्याचार के शिकार होती थी। जिसमें प्रमुख था "विधवाआओ" के साथ अनाचार। जिसका प्रमुख कारण बनता था। पति की मृत्यु।

पति के मर जाने के बाद औरत को जिंदा जलाया जाता था जिसे सती प्रथा कहते थे।यह प्रथा उच्च वर्ग के स्त्री द्वारा अपने लाज रक्षा के लिए अपनाएं जाते थे। परन्तु धीरे धीरे यह  प्रथा ने कुत्सित रुप धारण कर लिया।

और विधवा जिंदा जलाये जाने लगी। परन्तु छत्तीसगढ़ में एक और प्रथा का प्रचलन था levirate मतलब "देवर विवाह प्रथा"। इस प्रथा के अनुसार पति के मृत्यु हो जाने पर या तो पत्नी सति होती अथवा उसे देवर के साथ विवाह करना पड़ता था। इसके अंतर्गत पति के मृत्यु के बाद सति न होकर उसे देवर के साथ विवाह करने के लिए जबरदस्ती  किया जाता था।

इस प्रकार स्त्री मृत्यु के भय से सति प्रथा से बचने के लिए अपने अपने देवर से अनिच्छा के बावजूद विवाहेत्तर संबंध स्थापित करने के लिए विवश रहती थी। छत्तीसगढ़ में सति प्रथा ज्यादा प्रचलित नहीं था।
जबकि उनके देवर के पुर्व विवाहिता भी रहती थी।
स्त्री सदैव तिरस्कार और शोषण का जीवन व्यतित करती थी।

यदि कभी ऐसा हो जाता था कि स्त्री जिसके पति की मृत्यु हुई है। उसका देवर नाबालिग हो तो उस स्थिति में स्त्री को एक निश्चित राशि या उपहार देकर खरीद लिया जाता था। जिसे" बिसाय डौकी"  कहते थे तथा आजीवन दासी के समान सेवा सुश्रुषा तथा कामेच्छा पूर्ति करते हुए जीवन बिताना पड़ता था। 

या तो उसे अपने जीवन के बदले यह किमत चुकाना पड़ता था।
कुछ तो पुनः बेचा या बलात अपहृत कर ली जाती थी। तथा कुछ तो  नगर वधु (किसबीन या वैश्या )के जीवन बिताने के लिए विवश थीं। इस तरहां नारी का जीवन अत्यंत कष्टमय था ।

तब प्राणी मात्र के पीड़ा को समझने वाले, मनखे मनखे एक बरोबर का संदेश देते हुए गुरु घासीदास (1756)ने नारी के सम्मान के रक्षा के लिए चुड़ी प्रथा का संबोधन किया। और सती प्रथा तथा विधवा क्रय प्रथा का निरमुलन किया। उन्होंने कहा :- नर अउ नारी समान है।
उहला भी जीवन के अधिकार है।

नारी उपर अत्याचार झन करौ चुड़ी प्रथा चालू करौव।
इसी के साथ गुरु घासीदास ने टोनही प्रथा का भी विरोध किया।
और अंधविश्वास ला झन मानिहौ।
सत ला जांच परख तभे पतियाहौ। 

कहा इस प्रकार गुरु घासीदास ने सदियों से चली आ रही नारी शोषण के कुप्रथाओं का विरोध किया। और कन्या हत्या का भी विरोध किया। बलात्कार और अपहरण के द्वारा महिला शोषण के विपक्ष में गुरु घासीदास ने :- एक अंग के एके नारी बाकी बहिन बेटी महतारी का संदेश दिया और व्याभिचार का विरोध किया। 
तथा स्त्री और पुरुष के समानता आधारित समाज का निर्माण किया। जिससे महिलाओं को भी सम्मान पुर्वक जीने का अधिकार मिला। तथा आत्मरक्षा के लिए प्रेरित भी हुई।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि गुरु घासीदास  सतनाम आंदोलन (1820 से 1830 AD अंग्रेजी गजेटियर अनुसार) के महान समाज सुधारक और धर्म उपदेशक थे। जबकि राजाराम मोहनराय (1772 से1833) को नारी उत्थान का जनक कहा जाता है। 1829 में लार्ड विलियम बैंटिक ने सति प्रथा निषेध कानून लाया। और ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने 1856 में विधवा विवाह कराने में सफल रहे। परन्तु वे गुरु घासीदास ही थे जिन्होंने सर्व प्रथम महिला हित में आवाज उठाई। और महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने में कामयाब रहे। सतनामी समाज में पर्दा प्रथा का भी प्रचलन नहीं था। क्योंकि गुरु घासीदास स्त्री और पुरुष के समानता के पक्षधर थे।उनका धर्म दर्शन अत्यंत आधुनिक और 
सर्व कालिक था। आज उनके ही संघर्ष और सतनाम आंदोलन का परिणाम है कि सतनामी समाज में चुड़ी प्रथा का प्रचलन निर्बाध रूप से जारी है।???? 

लेखक श्री नरेन्द्र भारती

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