विशेष रिपोर्ट

कहीं आपको "कलर विजन" नामक आंखों की बीमारी तो नहीं? - श्री हुलेश्वर जोशी

कहीं आपको

H.P. जोशी नया रायपुर 

"जब मैं काले चश्मे पहनकर कड़ी धूप में निकलता हूँ तो रंगों की वास्तविकता समझ से परे हो जाता है; मतलब एक प्रकार से ^कलर विज़न^ का रोगी हो जाता हूँ" यही पूरे मानव समुदाय की समस्या है।

मेरा संकेत किसी एक विशेष विचारधारा के गेरुआ में बंधकर जीने वालों की ओर है। मेरा टारगेट किसी विशेष 'वाद' पर आंख मूंदकर जीने और दूसरे वाद को समझने से मना कर देंने वाले लोग हैं। मैं किसी एक वाद और विचारधारा का समर्थक अथवा विरोधी होने की मानसिकता के खिलाफ लिख रहा हूँ। मैं अपने विचार को दोहराना चाहूंगा जिसमे मैंने कहा है - "अत्यधिक उपयोगी और अच्छे रीति नीति भी समयकाल, सीमा और परिस्थितियों के अनुसार कुरीतियों में बदल जाते हैं अथवा जो पहले मानवता और प्रकृति के अनुकूल था कभी भी उसके प्रतिकूल हो सकता है।" आप कहेंगे मैं अपना विचार थोप रहा हूँ, हो सकता है थोप रहा हूँ ऐसा संभव है मगर सत्य तो यही है कि सदैव से विशिष्ट बुद्धि और शक्ति के लोग सदा से सामान्य बुद्धि और शक्ति वाले लोगों के ऊपर अपने विचार, नियम और संस्कृति को थोपते आ रहे हैं। मैं विशिष्ट बुद्धि और शक्ति वाला इंसान नहीं हूं मुझे होना भी नहीं, मैं किसी एक विचारधारा या वाद में पड़कर अपने बुद्धि और शक्ति को नियंत्रित करने के पक्ष में नही हूँ। यदि कोई व्यक्ति दुष्ट लक्ष्य और कुटिल कर्म से प्रेरित है तो उनके बुद्धि और शक्ति पर अवश्य रोक लगानी चाहिए, परंतु जिनसे सार्वभौमिक मानव समाज, जीव जंतुओं और प्रकृति को थोड़ा भी लाभ होने की संभावना हो उनपर नियंत्रण केवल उनके मानव अधिकार का हनन नहीं बल्कि सारे मानव समाज, प्राणी जगत और प्रकृति के साथ अन्याय है। 

निश्चित ही बुद्धि और शक्ति के सदुपयोग पर नियंत्रण करने वाले समस्त प्रकार के सिद्धांत, नियम और परंपरा गलत ही हैं। यदि आपके आध्यात्मिक, पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक सिद्धांत, नियम या परंपरा ऐसे ही आपके शक्ति और बुद्धि को काम करने से रोकती हो तो ऐसे बंधन से आपकी मुक्ति आवश्यक है। मैं केवल तीन विषय तक आपके शक्ति और बुद्धि की आजादी का वकालत नही कर रहा हूँ ये तीन केवल एक उदाहरण के लिए है। राजनैतिक, आर्थिक और प्रशासनिक विषयों पर बिना किसी राजनैतिक चश्मे के समीक्षा करने का अधिकार होनी चाहिये, यदि आप किसी एक मानसिकता से प्रेरित हैं तो आपके 90% समीक्षा गलत हो सकते हैं।  

आपके बुद्धि पर नियंत्रण लगा दिया जाए तो आप किसी निष्कर्ष पर नही पहुच सकेंगे, गुलाम ही रहेंगे। आपके दिमाक लगाने पर रोक लगा दिया जाए तो आप मनुष्य नही हो पाएंगे, आप कोई शोध नहीं कर पाएंगे आपके वैज्ञानिक होने की संभावना समाप्त हो जाएगा। जबकि हर मनुष्य में वैज्ञानिक होने के समान गुण है यह बात अलग है कि कोई अंतरिक्षयान बना सकता है कोई खेत में मेड बना सकता है कोई भोजन में नए स्वाद ला सकता है कोई फुलवारी के जगह सब्जी की बाड़ी लगा सकता है। कोई आपके मानसिकता को बदलकर सद्गुणों की ओर ले जा सकता है तो कोई आपको दुर्गुणों की कोठी बना सकता है। यदि मैं आपके बुद्धि पर नियंत्रण करने के पक्ष में हूँ इसका मतलब यह है कि मुझे आपके बुद्धि पर संदेह है आपको मूर्ख या कुटिल समझता हूं; यदि मैं आपके शक्ति में नियंत्रण का वकालत करता हूँ इसका मतलब आपको दुष्ट समझता हूं या फिर मुझे अपने शक्ति के क्षीण होने से भयभीत हूँ।

अंत में, आपसे अनुरोध है बुद्धि और शक्ति का मुक्त परंतु संतुलित प्रयोग करिए, किसी एक वाद या विचारधारा में बंधकर मत रहिए। विकासशील रहिए स्वयम को विकसित होने के भ्रम में मत रखिए, देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार आप भी आगे बढिए.... कब तक पीछे चलकर भीड़ बढ़ाने का काम करेंगे कभी अपने पीछे बड़ी भीड़ बनाकर बढ़ने का प्रयास करिए। क्योंकि जो भीड़ का नेतृत्वकर्ता है उसमें और आपमें बराबर योग्यता है, केवल जरूरत है तो अपने बुद्धि और शक्ति को जानने की; इसलिए अपने बुद्धि और शक्ति का समीक्षा करिए, वैज्ञानिक बनकर शोध करिए। मैं जिस काले चश्मे को पहनकर धूप में निकलता हूँ वह मेरे समझ को संकुचित कर देती है इसलिए अब मैं सनग्लास वाला चश्मा पहनना शुरू कर दिया हूँ धूप में कई बार अपने चश्मे भी निकाल कर सामने वाले का समीक्षा भी कर लेता हूँ। आप भी काले चश्मे से मुक्त होने का प्रयास करिए, क्योंकि ये जो काले चश्मे है कलर विजन बीमारी से कम नही है।

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लेखक - शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर है परंतु अंगूठाछाप लेखक "अभिज्ञान लेखक के बईसुरहा दर्शन" नामक आत्मकथा लिखने में मस्त है।

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