विशेष रिपोर्ट

लोकतंत्र के बिखरते स्तम्भ

लोकतंत्र के बिखरते स्तम्भ

लेख : एम.एच.जकरीया 

लोकतंत्र के चार स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता हैं. स्वाभाविक-सी बात है कि जिस सिंहासन के चार पायों में से एक भी पाया ख़राब हो जाये, तो वह अपनी आन-बान-शान गंवा देता है !

हम फिर से एक बार वर्ष 2018 में 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस मनाने जा रहे है  इन 69 वर्षो में हमारे देश ने ना जाने कितने उतार-चढाव देखे है,  लेकिन जिस तरह का माहौल और परिस्तिथियाँ अभी देश में चल रहा है उससे आम जनता कितनी खुशहाल है ये तो जनता ही बताएगी लेकिन हालातों का जायज़ा लेने का अधिकार तो इस संविधान दिवस पर सभी का बनता है, फिर लाल किले के प्राचीर से नए-नए सन्देश और आश्वासन ही क्यों ना दिए जायें.

तिरंगा सलाम के लिए इमेज परिणाम

आइये हमारे देश के इस संविधान पर्व को फिर से एक बार और समझने की कोशिश करते है, क्या होता है गणतंत्र का मतलब गणतन्त्र (गण+तंत्र) का अर्थ है, जनता के द्वारा जनता के लिये शासन और जनता ने पुरे विश्वास के साथ सरकार को चुना, उनके द्वारा दिए गये आश्वासनों की उम्मीद में है की कब हमारी उम्मीदे पूरी होगी लेकिन क्या सच में ऐसा कुछ हो रहा है ?

 भारत देश के सभी जाति वर्ग-धर्म जो भारत के नागरिक है सब हर्षोल्लास के साथ इस पर्व को मनाते रहे है, लेकिन क्या वर्तमान में हमारा देश ऐसे सौहार्द पूर्ण माहौल से गुजर रहा है, इस पर सोचना होगा, विगत 3 वर्षो से जिस तरह की घटनाएँ देश में घटित हो रही है उससे विश्व समुदाय में हमारी साख को धक्का लगा है चाहे वो धर्म और गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों का कत्लेआम हो या दलितों पर उत्तरप्रदेश के सहारनपुर की दलित हिंसा हो, या गुजरात का ऊना और महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों पर हुए हमले हो या देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के न्यायधिशो के द्वारा न्यायपालिका के कार्यो पर टिप्पणी हो क्या यही हमारे देश के गणतन्त्र की पहचान बन गई है ?

दलित हिंसा के लिए इमेज परिणाम

देश के चंद लोगो को छोड़ दिया जाये तो किसी को खुलकर बोलने की आज़ादी भी नहीं है , और अगर बोलता भी है तो उसे एक सु-नियोजित समूह के द्वारा उनपर गालियों की बौछार की जाती है जिसे (ट्रोल और मोब्लिचिंग) भी कहा जा रहा है जिसमे महिलाओ को बलात्कार की धमकी दी जाने लगी है ऐसे वीभत्स और विकृत मानसिकता का घिनौना रूप देश में कभी भी नहीं देखा गया जहाँ शम्भू रैगर जैसे लोग अपना घिनौना अपराध छुपाने के लिए एक बेक़सूर को लव जिहाद के नाम पर सरे आम मार कर जला देता है, और भीड़ उसकी जय जय कार करती है और हम उसके प्रति संवेदना व्यक्त करने से भी घबराने लगते है ! क्या हमने ऐसे लोकतन्त्र की कल्पना की थी ?

हमारे देश के लोकतंत्र के चार स्तंभ हैं, एक न्यायपालिका,  दूसरी कार्यपालिका,  तीसरी विधायिका और चौथी पत्रकारिता। ये चारों खम्भे टिके कहाँ होते हैं ?  इन खम्भों के ऊपर क्या टिका होता है, जनता का विश्वास,  जाहिर सी बात है खम्भे हवा में तो नहीं टिके होते और अगर इनके ऊपर कुछ टिकाना नहीं होता तो इन्हें बनाने का भी कोई औचित्य नहीं !  ये खम्भे टिके होते हैं जनता नाम की जमीन और लोकतंत्र के भरोसे पर और यही जनता की सुरक्षा और विश्वास को देने का कार्य करता है, लेकिन हकीकत में क्या ऐसा कुछ हो रहा है ?

संसदीय लोकतंत्र में विधायिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. संसद और विधानसभाओं का सबसे अहम काम कानून बनाना है. विधायिका जनता की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वोच्च संस्था है. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार स्तंभ है, जो जनता का प्रतिनिधित्व करती है.

वर्तमान में विधानसभाओं के सत्र लगातार छोटे होते जा रहे हैं. विधायक बिना तैयारी के कार्यवाही में हिस्सा लेते हैं. सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विधेयक बिना किसी बहस और हस्तक्षेप के सदन से पारित होते जा रहे हैं.  विधायक विधायी नियमन का एक तो पालन नहीं करते और बहुत से अवसरों पर उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं होती. एक और चिंतनीय विषय है कि सदन में अमर्यादित आचरण और शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है । 

हाल के दिनों में भारत में हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए आपको कुछ खास बाते बताते हैं। सत्ता में आई नयी सरकार को तीन साल हो गए है इन तीन सालो में कुछ ऐसे फैसले लिए गए जिसकी किसी को उम्मीद तक नहीं थी,  उनमे सबसे बड़ा फैसला नोटबंदी का था. नोटबंदी का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री ने अपने फैसले को काले धन के खिलाफ लड़ाई का पहला ऐतिहासिक कदम बताया था। जिसके बाद मीडिया हाउसों ने उनके फैसले को सर्जिकल स्ट्राइक”  का नाम दिया और फिर वाह -वाही भी की। इक्का - दुक्का  मीडिया हाउसों को छोड़ दे तो किसी ने भी नोटबंदी के दौरान हुए 105 लोगों की मौत का जिक्र तक नहीं किया, कितनों की शादी टूट गयी इसका भी कही जिक्र नहीं किया साथ ही नोटबंदी के दौरान भारत की डगमगाई अर्थव्यवस्था और बेरोजगार हुए लाखों युवाओं का कही भी जिक्र नहीं था।

आल इंडिया मैनुफैक्चर ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक "माइक्रो स्केल इंडस्ट्रीज" में 35% लोग बेरोजगार हुए है और तकरीबन 60% का नुकसान छोटी बड़ी इंडस्ट्रीज़ को झेलना पड़ा था”। वहीं आने वाले वक्त में आइटी सेक्टर में हर साल 2 लाख लोगों की नौकरियां जाने वाली हैं इसका भी कहीं जिक्र नहीं हो रहा है । क्यूंकि हमारे कुछ मीडिया हाउस प्रोपेगेंडा फैलाने में व्यस्त है उनको देश में बढ़ती बेरोजगारी और गिरती जीडीपी से कोई लेना देना नहीं है। वो तो "कैराना का पलायन" और तीन तलाक जैसी खबरे चला कर टी आर पी के खेल में बने रहना चाहते हैं ? हमारे इस लेख के माध्यम से हम पूछना चाहते हैं कि, ‘’क्या यही गणतन्त्र है’’ ?

 

 

More Photo

    Record Not Found!


More Video

    Record Not Found!


Related Post

Leave a Comments

Name

Contact No.

Email