संपादकीय

मोदी को कितनी चुनौती 'आप' की?

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राजनीति में मुख्य रूप से दो प्रकार के गणित होते हैं। एक वास्तविक गणित और दूसरा अवधारणात्मक गणित। राजनीतिक जानकार इन दोनों ही आधार पर किसी पार्टी या नेता की लोकप्रियता का मूल्याँकन करते रहते हैं। ज़रूरी नहीं कि जो अवधारणा हो वैसा ही नतीजा हो और जैसा नतीजा हुआ है उसके आधार पर नई अवधारणा के लिए कोई गुज़ाइश न हो। कई प्रकार के अपवाद हैं।

अरविंद केजरीवाल के उदय से और आम आदमी पार्टी के लोक सभा चुनाव में उतरने के एलान से अवधारणात्मक गणित में एफ नया फ़ैक्टर आ गया है । दिल्ली से संचालित मीडिया स्पेस में मोदी के बराबर अरविंद को जगह मिलने लगी है। बीजेपी हो सकता है कि अपना ध्यान क्षेत्रीय मीडिया स्पेस पर लगाये लेकिन अरविंद वहाँ भी पहुँच सकते हैं । इसलिए दोनों के लिए इस वक्त नया मीडिया स्पेस तलाशने से कोई फायदा नहीं है । स्पेस के लिहाज़ से अवधारणात्मक गणित बनाने का मंच राष्ट्रीय मीडिया ही है। अख़बारों के ज़िला संस्करण अवधारणा बनाने के सशक्त उपकरण नहीं हैं । वे भी राष्ट्रीय मीडिया के विस्तार हैं । उनकी भूमिका से इंकार नहीं कर रहा लेकिन ज़िला संस्करण भी भाषणों से राष्ट्रीय तत्वों का ही चयन करता है। 

तो क्या आम आदमी पार्टी मोदी को चुनौती देगी? इसका सरल जवाब है। चुनौती तो देगी मगर दे नहीं पायेगी। कारण यह है कि अवधारणात्मक गणित में मोदी काफी आगे निकल चुके हैं। आप दिल्ली की तरह हर जगह कांग्रेस का ही विकल्प बनेगी। वह यूपी में सिर्फ मोदी से नहीं लड़ पायेगी। उसे अखिलेश यादव और मायावती से भी लड़ना होगा। दिल्ली में एक ही टारगेट था। आप को मिलने वाला हर वोट मोदी की जीत को पक्का करेगा। दिल्ली के नतीजे यही बताते हैं। दिल्ली में बीजेपी भले नहीं जीत पाई मगर वो हारने से इसलिए बच गई क्योंकि मोदी ने बचा लिया। वर्ना आम आदमी पार्टी के सामने कांग्रेस की तरह बीजेपी भी पंद्रह बीस सीटों वाली बन कर रह जाती। दिल्ली के उदाहरण से बीजेपी को बौखलाना नहीं चाहिए। आप भले ही मोदी को निशाना बनाएगी क्योंकि पहले के लेख में भी कह चुका हूँ कि अवधारणात्मक ज़मीन पर मोदी ही नंबर वन हैं। वहाँ आप दूसरे या तीसरे नंबर के मनमोहन सिंह या कांग्रेस को टारगेट कर उसे लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन क्या बीजेपी को भी आप को नम्बर वन टारगेट समझना चाहिए? क्या बीजेपी आप को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम उठा सकेगी? जीत के प्रति आश्वस्त होने के बावजूद।

यह सही है कि आप की कामयाबी ने राजनीतिक चर्चा को बदल दिया है। यह भी सही है कि आप की टीम तीन सौ ज़िलों में मौजूद है। लेकिन वे तीन सौ ज़िले दिल्ली नहीं हैं। उनमें से कई ज़िले ज़रूर हो सकते हैं । कई शहर हो सकते हैं। दिल्ली में ही आप के लिए देश भर से वोलिंटियर काम करने आ गए थे। क्या आप यही रणनीति हर जगह पर दोहरा पाएगी? इंडियन एक्सप्रेस में योगेंद्र यादव का इंटरव्यू दिलचस्प है। आख़िर में योगेंद्र ने कहा है कि काश हम चुनाव आयोग से कह पाते कि लोक सभा चुनाव एक साल के लिए टाल दीजिये। 

हाँ यह ज़रूर है कि आप ने अवधारणात्मक ज़मीन पर की जाने वाली गणित में मोदी का खेल बिगाड़ दिया है। मोदी पर अरविंद का हमला ज़्यादा आक्रामक और विश्वसनीय सा लगेगा। कांग्रेस आज दिल्ली में एंटी करप्शन यात्रा कर रही है। किसी चैनल पर यह फ़्लैश देखा है। यह महज़ नौटंकी है। आप की तरह रंग बदल कर कांग्रेस बीजेपी आप नहीं हो सकती । इससे लाभ आप को ही मिलेगा। लेकिन कांग्रेस से ज़्यादा फायदा बीजेपी को मिल सकता है। कांग्रेस जितना भ्रष्टाचार के विरोध को लेकर मुखर होगी आप की डुप्लीकेट लगेगी। इससे उसका वोटर आप में बँटेगा और कई शहरी क्षेत्रों में बीजेपी की तरफ़ जायेगा। तो जैसा मैं कह रहा था कि अवधारणात्मक गणित में अरविंद को नंबर तो मिलेंगे क्योंकि जानकार दिल्ली की तरह छह सीटें देने की ग़लती दोबारा नहीं करेंगे। आप को इस बार ज़्यादा सीटें देंगे। जिसके कारण अरविंद मोदी की दावेदारी को अपने सवालों से अवधारणात्मक चुनौती देने लगेंगे। कुमार विश्वास का यह बयान तुकबंदी नहीं है कि अगर मोदी वैचारिक रूप से वंशवाद के इतने ही ख़िलाफ़ हैं तो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ क्यों नहीं लड़ते। यह चुनौती कांग्रेस या लेफ़्ट की तरफ़ से नहीं आ सकता। मोदी भले ही चुप हो जाएँ मगर पब्लिक को तर्क के लिए ही सही एक नया मसाला तो मिल ही गया। 

इसीलिए नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं होगा कि वे आप को नज़रअंदाज़ करें। आप के खाते में गए लोग कांग्रेस और बीजेपी स़े निकले हुए हैं। मोदी ने शुरू से ही पहली बार मतदाता बने युवाओं को ज़्यादा टारगेट किया है और उनमें अपनी पकड़ ज़रूर बनाई है। मोदी ने उन्हें इसलिए टारगेट किया कि ये नए लोग हैं। इनकी निष्ठाएँ नईं हैं। यो बीजेपी की कमज़ोरियों से कम वास्ता रखते हैं इसलिए नेतृत्व की मज़बूत दावेदारी को फिर से उभारा गया जिसे दो दो बार आडवाणी जी सामने लाकर कमज़ोर मनमोहन से हार गए। मोदी ने इस पिटे हुए फ़ार्मूले को युवाओं के बीच ले जाकर लोकप्रिय बना दिया। अब अरविंद के आने से पहली बार मतदाता बने युवाओं के बीच मोदी और अरविंद में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा होने जा रही है। पार्टियों की निगाह में यह पहली बार मतदाता ज़्यादातर शहरी और पब्लिक स्कूल वाला है। इनके बीच से एक वोटर का भी मोदी से अरविंद की ओर जाना नुक़सान तो होगा ही। फिर भी यह बात अवधारणात्मक स्तर पर ही ज़्यादा प्रबल लगती है। वास्तविक गणित के धरातल पर कमज़ोर। 

अगर टीवी और सोशल मीडिया को यह श्रेय दिया जा रहा है कि आप इनकी पैदाइश है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी काल्पनिक मीडिया के असर के कारण बीजेपी में मोदी की दावेदारी प्रखर हुई थी। मोदी की टीम ने भी इसे काफी प्रचारित किया था कि टीवी वालों को टीआरपी आती है इसलिए मोदी को दिखाते हैं क्योंकि मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। इस तरह की बातें बीजेपी के कई नेताओं ने डिबेट शो में कहीं हैं। वे यह भूल गए कि टीवी को सनसनी, स्पीड न्यूज़ और क्रिकेट से भी टीआरपी मिलती है। अरविंद के कारण भी मिल रही होगी ! इसलिए अब इस चरण पर आकर आप मीडिया के प्रभाव (विवादास्पद) को ख़ारिज नहीं कर सकते। 

ज़ाहिर है मोदी आगे हैं। उनके पास संगठन है। आप के पास वोलिंटियर की ताक़त तो है मगर हर जगह समान सघनता नहीं है। लेकिन जिस तरह से कई जगहों पर लोग आप की तरफ़ देख रहे हैं, बीजेपी आगे होते हुए भी इस नए फ़ैक्टर को अनदेखा नहीं कर सकती हैं। शहरीकरण के प्रसार को मोदी की कामयाबी से जोड़ा जा रहा था। इसमें एक और दावेदार आ गया है जो नया और आकर्षक है। दिल्ली की सात सीटों के अलावा आस पास की कुछ सीटों पर आप की मौजूदगी दस बीस तो हो ही जाती है। आगरा, कानपुर, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, पुणे, फ़रीदाबाद, गुड़गाँव, भिवानी, बंगलुरू जैसी सीटें। क्या बीजेपी ऐसी पंद्रह सीटों को अनदेखा करने का जोखिम उठा सकती है? हाँ अगर गडकरी अरविंद पर हमला करते हैं तो ज़रूर फ़ायदा आप को होगा। देखते हैं नरेंद्र मोदी कब तक आप या अरविंद को नज़रअंदाज़ करते हैं। मोदी के लिए मिशन 272 के लिए एक एक सीट ज़रूरी है। पहले तो उन्हें वाजपेयी के 186 सीटों का रिकार्ड तोड़ना है फिर मनमोहन सिंह से बड़ा नेता (२००९ के अनुसार) बनने के लिए 206 से ज़्यादा सीटें लानी हैं इसलिए वास्तविक गणित का वक्त आने से पहले अवधारणात्मक गणित की कापी पर काट पीट और बढ़ जाएगी।

 

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