संपादकीय
दुख किससे कहें दंगों के मारे लोग


राजनीतिक संवेदनहीनता का आईना हैं मुजफ्फरनगर दंगा पीडि़तों के कैंप 


नरेंद्र नाथ 
समाज में नफरत का फैलाव रोकने के बजाय उसपर सियासत करने के परिणाम कितने भयावह होते हैं, इसका अंदाजा उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद बने हालात से लगाया जा सकता है। आतंकी संगठनों ने इस नफरत की आग को और भड़काने की साजिश कर डाली। दिल्ली पुलिस की जांच में यह बात साबित हो चुकी है। सवाल उठता है कि ऐसी नौबत क्यों आई। दरअसल, दंगे के चार महीने बाद भी इसके पीडि़तों के जख्म भरने के बजाय दिनोंदिन हरे ही होते जा रहे हैं। कभी मुलायम सिंह यादव दंगापीडि़तों पर कांग्रेस और बीजेपी का एजेंट होने का आरोप लगाते हैं तो कभी राहुल गांधी उनके आईएसआई से जुडऩे की आशंका जताते हैं। दंगा प्रभावित गांवों के कुछ मु_ी भर लोगों के शांति प्रयासों में साथ देने के लिए इनमें कोई भी आगे नहीं आ रहा है। 
गिरेबान बचाने की चिंता 
दंगे के बीच से वोटों तक का रास्ता बनाने की इस कशमकश में इन हजारों लोगों का दर्द कहीं खो सा गया है। यूपी सरकार फजीहत से बचने के लिए राहत कैंपों को आनन-फानन में उनकी जगह से हटा रही है। ग्राउंड जीरो पर जाने पर पता चलता है कि अभी वहां सरकार का पूरा ध्यान अपनी छवि दुरुस्त करने पर है। इस कोशिश में उसकी और फजीहत हो रही है। अभी तक स्थिति यही है कि दंगे के बाद से मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाके तमाम महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए दंगा टूरिज्म का गढ़ बन गए हैं। इसके समानांतर ब्लेम-गेम की तू-तू-मैं-मैं अलग चल रही है। दंगा प्रभावित गांवों में अभी भी पीएसी जवानों के कैंप लगे हुए हैं। सुनसान घरों में टहलते टीवी कैमरे इलाके के माहौल में तल्खी बढ़ाने की भूमिका निभा रहे हैं। आए दिन टकराव की छिटपुट खबरें भी आ रही हैं। लेकिन प्रदेश सरकार इन पहलुओं पर नजर रखने के बजाय विस्थापितों के कैंप हटाकर मामले को डायवर्ट करना चाहती है। 
जानकार बताते हैं कि अखिलेश सरकार के बीते डेढ़ वर्षों में एक के बाद एक दंगे इसी कैजुअल एप्रोच के कारण हुए। इस बार भी दंगों के बाद स्थायी हल तलाशने के बजाय सारी कोशिश समस्या से फौरी निजात पाने पर ही है। उत्तर प्रदेश सरकार को यह बात नागवार गुजरी कि दिल्ली से सटा होने के कारण दूसरी पार्टियों के बड़े नेता अक्सर वहां पहुंचने लगे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दो बार राहत शिविर का दौरा कर चुके हैं। मीडिया की नजर में शिविर की बदइंतजामी भी आ गई। तीन दर्जन से अधिक बच्चों की मौत राहत कैंप में ठंड से हो गई और सरकार के नेता और अफसर इसपर व्यंग्य भरे कमेंट मारते रहे। दरअसल दंगों को लेकर एसपी का आकलन यह था कि वह मुसलमानों की रहनुमा बनकर उभरेगी और लोकसभा चुनाव से पहले उनके जख्मों पर इस तरह मरहम लगाएगी कि वे उसके मुरीद हो जाएंगे। लेकिन दांव उलटा पड़ा। जख्मों पर मरहम की जगह नमक लग गया। 
राहत की एक बानगी देखें। 80 साल के जुबैर के 6 बालिग लड़के हैं और सभी अपना अलग घर बसा चुके हैं। लेकिन प्रशासन ने उन्हें मात्र एक परिवार मान कर पुनर्वास के नाम पर 5 लाख रुपये पकड़ा दिए। जिस दिन सबसे बड़े राहत कैंप लाई के लगभग पांच सौ परिवारों को वहां से हटने का फरमान सुनाया गया , उस दिन ऑन रिकार्ड मात्र 155 लोगों को राहत की राशि मिली थी। चार महीने बाद भी अगर सरकार इन्हें ढंग से राहत नहीं दे पाई तो फिर किस बात के लिए इतना गाल बजाया जा रहा है ? राहत कैंप से हटने वालों को कोई निश्चित ठौर - ठिकाना नहीं बताया जा रहा है। सरकारी फैसले के अनुसार उन्हें बगल में कहीं पक्के मकान में शिफ्ट किया जाएगा। लेकिन खुद प्रशासन का कहना है कि वह सभी पीडि़तों को आवास देने की स्थिति में नहीं है। इस पर प्रदेश सरकार का कहना है कि कई पीडि़त महज नाटक कर रहे हैं और वे फर्जी तरीके से सरकारी लाभ लेने के लिए यहां आ गए हैं। 
कौन किसका एजेंट 
सवाल उनके सामने भी है , जिन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा मिल चुका है। वे अपने गांव से सब कुछ गंवा कर आए हैं। ऐसे में कहीं जमीन खरीदकर घर बनाने में उन्हें वक्त लगेगा। वे सरकार से यह वक्त चाहते हैं। जहां से वे उजड़ कर आए हैं , उन गांवों में जाने को बिल्कुल तैयार नहीं है। न ही उन्हें वहां लौटाने की कोई गंभीर कोशिश हुई है। कैंप से पीडि़तों को लौटाने के लिए बीच - बचाव करने को कोई राजी नहीं है। दंगे कई ऐसे इलाकों में भी हुए हैं , जहां 1947 और 1991 में भी नहीं हुए थे। कैंप में आतंकी साजिश के बारे में पूछने पर लोग रो देते हैं। वे अपने मासूम बीमार बच्चों और औरतों की दशा दिखाकर पूछते हैं कि इनमें कौन कांग्रेस - बीजेपी या फिर आईएसआई का एजेंट दिखता है। राहत कैंप के लोग अभी लाचार हैं। चुप हैं। लेकिन उनकी चुप्पी में कई सवालों की गूंज है , जिसका असर सियासत के ऊंचे पायदानों तक पहुं चेगा।
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सभ्य समाज की असभ्यता


आशिमा
पिछले दिनों कनाडा पुलिस ने दुनिया भर में बाल यौन शोषण में लिप्त एक गिरोह का पर्दाफाश किया। उसने कई देशों के शिक्षक, डॉक्टर और अभिनेताओं समेत करीब 350 लोगों को गिरफ्तार किया और 386 बच्चों को मुक्त करवाया। कनाडा पुलिस मामले की 2010 से ही जांच कर रही थी। उसने इंटरपोल, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, मेक्सिको, नॉर्वे और ग्रीस सहित 50 से भी अधिक देशों के साथ मिलकर काम किया। अधिकारियों ने हजारों की संख्या में बच्चों के अश्लील विडियो बरामद किए।
जाहिर है ऐसे गिरोह का पकड़े जाना अपने आप में एक बहुत बड़ी कामयाबी है, लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ी गंभीर समस्या भी सामने आई है। जितने आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, और जितने बच्चों को छुड़ाया गया यह कोई छोटी संख्या नहीं है। सोचा जा सकता है कि कितने बच्चों के साथ बहुत बड़े पैमाने पर दुष्कर्म हो रहा होगा। आज के दौर में बच्चों पर सबसे बड़ा खतरा इसी अपराध का है। बहरहाल गूगल और माइक्रोसॉफ्ट मिलकर ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं जिससे इंटरनेट पर बच्चों की अश्लील सामग्री को धीरे-धीरे खत्म किया जा सके।
इसे पश्चिम की समस्या समझ कर छोड़ नहीं देना चाहिए क्योंकि अपने देश में भी कितनी ही ऐसी खबरें आतीं हैं। हमारे महानगरों से, जहां कथित रूप से पढ़ा-लिखा और जागरूक वर्ग रहता है, बीते दिनों दिल दहला देने वाली खबरें सामने आईं। एक एयर होस्टेस ने घर में काम करने वाली बच्ची को असहनीय शारीरिक प्रताड़ताएं दीं, उससे भी पहले के समय में जाएं तो एक डॉक्टर दंपती खबरों में था, जिन्होंने एक बच्ची को घर में काम करने के लिए रखा था। उसे वे घर में बंद करके जाते थे, खाने तक को तरसाते थे, मारने पीटने का तो हिसाब ही नहीं। ऐसी कुंठित और बीमार मानसिकता आखिर कहां से जन्म ले रही हैं, जो बच्चों तक को नहीं बख्श रहीं? और यह सब भी तब है, जब 14 साल से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखने पर पाबंदी है।
आखिर रुतबे वाले लोगों में इतनी हिम्मत आती कहां से है कि वे इस कानून का उल्लंघन करें, और ऊपर से काम पर रखने के साथ-साथ उनको शारीरिक प्रताडऩाएं दें? इसका सबसे पहला जवाब यह हो सकता है कि बच्चे मासूम और निरीह होते हैं, इसलिए वे बड़े लोगों का बराबरी की ताकत से विरोध नहीं कर सकते और आसानी से डराये और धमकाए जा सकते हैं। इसलिए सस्ती लेबर का साधन अब तक बच्चे ही देखे गए हैं जिन्हें न केवल डरा कर बल्कि बिना किसी मेहनताने के आसानी से काम करवाया जाता है।
इसके साथ ही मानव तस्करी भी जोरों पर है, जिसके सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं और बच्चे होते हैं। अखबारों में प्राय: किसी न किसी दिन बच्चों के गायब होने की खबरें आम हो गईं हैं। निठारी कांड अब भी हमारे जेहन में ताजा है। बलात्कार और दुष्कर्म की खबरें सो अलग। महानगरों से हटकर यदि ये ही बच्चे किसी गैर कानूनी संगठनों के हाथ लग गए तो स्थिति और भी बदतर होती है, क्योंकि कई आतंकवादी संगठनों में इन्हीं कोमल हाथों में बंदूक थमा कर तबाही का पाठ पढ़ाया जाता है। यह बात भी जग जाहिर है कि चाइल्ड पॉर्न के गोरखधंधे में सबसे ज्यादा तीसरी दुनिया के बच्चों का इस्तेमाल होता है।
पंचवर्षीय योजनाओं में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर कार्यक्रम चलाए गए हैं। सरकार योजनाओं में बच्चों के हालात के प्रति जागरूक नजर आती है। पर व्यवहार में कुछ और है। दरअसल इस मामले में दोहरा रवैया अपनाया जाता है। संपन्न तबके के बच्चों को तो सभी सहूलियतें हासिल हैं पर गरीब बच्चों को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। बच्चों के लेकर कोई आवाज भी नहीं उठाई जाती। इसलिए सरकार पर कोई दबाव नहीं बन पाता। अगर वाकई सरकार अपने को लोक कल्याणकारी कहती है तो उसे सभी वर्गों के बच्चों पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए।
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चुनौतियों की तस्वीर

पिछले कुछ वर्षो में सामरिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए संप्रग सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रबंधन क्षमताओं में भारी कमी आने के साथ भारत का वाह्य वातावरण जटिल से जटिल होता जा रहा है। विदेश नीति के अहम मसलों पर समग्र आमसहमति कायम करने में सरकार की विफलताओं ने भी भारत के राष्ट्रीय हितों को चोट पहुंचाई है। पिछले साल यही बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों में उजागर हुआ और श्रीलंका के साथ रिश्तों के मामले में भी। बांग्लादेश के साथ संबंध तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के कारण प्रभावित हुए तो श्रीलंका से रिश्तों पर तमिल दलों के कारण ग्रहण लगा।

विदेश और सुरक्षा नीति को व्यवस्थित करने वाला संस्थागत ढांचा असंतुलित हो गया है। विदेश मंत्रालय के संदर्भ में अब यह नहीं कहा जा सकता कि वह सभी तरह की विदेश नीतियों को मजबूत करने के अपने बुनियादी उद्देश्य की पूर्ति में सक्षम है। विदेश मंत्रालय की यह भूमिका दिन-प्रतिदिन सिमटती जा रही है। उसे सुधारों की आवश्यकता है, लेकिन उसे अपना बुनियादी काम भी करने दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने न केवल विदेश मंत्रालय को अपने आवरण में ले लिया है, बल्कि उनकी छाया देश के विदेशी संबंधों के सभी पहलुओं पर पड़ रही है। इससे भी देश के हितों को नुकसान पहुंचा है।

आम चुनाव करीब आने के साथ राजनीतिक वर्ग के साथ-साथ आज जनता का ध्यान आंतरिक मुद्दों पर केंद्रित होगा। इसके फलस्वरूप विदेश नीति और सामरिक मामलों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाएगा। अगर चुनावों में विभाजित जनादेश सामने आता है तो अपने पड़ोस में होने वाली घटनाओं को प्रभावित करने की भारत की क्षमता भी घटेगी, क्योंकि विदेश नीति के मसलों पर घरेलू राजनीतिक दबाव हावी होंगे। इसके साथ ही पड़ोसी देश, विशेषकर पाकिस्तान महसूस करेगा कि भारत चूंकि आंतरिक प्रतिबद्धताओं में जकड़ा हुआ है इसलिए इस्लामाबाद उन मामलों में आसानी से आगे बढ़ सकता है जो भारत के हित को चोट पहुंचाने वाले हैं और उसे नई दिल्ली के पलटवार के खतरे का भी सामना नहीं करना पड़ेगा।

देश को 2014 में विदेश नीति और सामरिक दृष्टि से जिन मुख्य चुनौतियों का सामना करना होगा वे उसके आस-पड़ोस ही स्थित हैं। उत्तार में नेपाल से लेकर दक्षिण में मालदीव तक और पूरब में बांग्लादेश से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक भारत का पड़ोसी इलाका राजनीतिक अस्थिरता और बदलाव के दौर से या तो गुजर चुका है या गुजर रहा है। यह निराशाजनक है कि भारत मालदीव के मामले में अलग-थलग और अप्रभावी नजर आया। ऐसा ही कुछ अन्य देशों के संदर्भ में भी रहा। यह सही है कि पड़ोसी देशों की आंतरिक राजनीति में सीधी घुसपैठ से आमतौर पर बचा जाना चाहिए, लेकिन अपने देश के हितों को मजबूत करने के और भी तरीके होते हैं। भारत इन तरीकों का इस्तेमाल करने के मामले में नाकाम साबित हुआ है। नेपाल भारत की सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है और यह आवश्यक था कि भारत संविधान और देश के राजनीतिक भविष्य के लिए सभी दलों के बीच सहमति कायम करने में सफल रहता, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। बांग्लादेश के मौजूदा राजनीतिक ढांचे ने देश के हितों को भारत के साथ जोड़ने की कोशिश की, लेकिन संप्रग सरकार इलाकों की अदला-बदली के रूप में सीमा समस्या के अंतिम समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों को एक जगह लाने में नाकाम रही। ऐसा ही बांग्लादेश के साथ पानी के बंटवारे को लेकर भी हुआ और अब यह अनिश्चित है कि ऐसा मौका फिर आएगा कि नहीं?

2014 में भारत की विदेश और सुरक्षा नीति का असली इम्तिहान अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होगा। 2013 में इन संवेदनशील देशों के साथ भारत के संबंधों को दिशा देने के मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उनकी विदेश और सुरक्षा नीति टीम नौसिखिया साबित हुई। गत मई में नवाज शरीफ को उनकी चुनावी जीत के बाद गले लगाने की हड़बड़ी दिखाने की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन एक अभूतपूर्व घटनाक्त्रम में शरीफ के पदभार संभालने के पहले ही उन्हें मुबारकबाद देने के लिए एक खास दूत भेज दिया गया। स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान की सर्वशक्तिशाली सेना के नेतृत्व में वहां के सैन्य प्रतिष्ठान ने भारत के साथ दुश्मनी के पुराने रंग-ढंग नए सिरे से दिखाए तो नई दिल्ली के हाथ निराशा के अलावा कुछ नहीं लगा। शरीफ के सत्ता संभालने के बाद से ही सीमा तनाव का ठिकाना बनी हुई है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की ओर से ऐसे कोई संकेत भी नहीं मिले कि वह आतंकवाद के जरिये भारत को घाव देने की अपनी आदत-नीति त्यागने का इरादा रखता है।

नवाज शरीफ पाकिस्तान की विदेश नीति पर सिविलियन कंट्रोल स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसमें संदेह है कि सेना उन्हें भारत और अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के में संबंधों के मामले में अंतिम फैसला लेने की इजाजत देगी। स्पष्ट है कि भारत को 2014 में बेहद सतर्क रहना होगा व अतीत की गलतियों को दोहराने से बचना होगा। यह सुनिश्चित करना खास तौर पर अहम है कि भारत की अफगान नीति पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की आशाहीन आकांक्षा की बंधक न बनने पाए।

अगले कुछ माह अफगानिस्तान के लिए बेहद अहम हैं। अप्रैल में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और नाटो बलों की संख्या भी घटने लगेगी। नाटो सैन्य बलों में कमी आने से तालिबान को फिर से मजबूती हासिल करने का मौका मिलेगा, लेकिन अगर चुनाव सफलतापूर्वक हो जाते हैं तो अफगानिस्तान के सुरक्षा बल एक उदार और लोकतांत्रिक सरकार के अधीन काफी हद तक तालिबान की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

इस समय तो यह आवश्यक है कि राष्ट्रपति करजई सत्ता के सहज हस्तांतरण की तैयारी करें, लेकिन वह अभी भी तरह-तरह के खेल खेल रहे हैं। भारत को उन्हें कुछ परिपक्वता दिखाने की सलाह देने की जरूरत है। इसके साथ ही भारत को अफगान बलों को भी मजबूत बनाना होगा, विशेषकर उन्हें वे हथियार देकर जिनकी इच्छा काबुल ने जताई है।

चीन के साथ भारत के संबंधों के मामले में चुनौतियां एकदम स्पष्ट हैं और यह चुनौतियां केवल सीमा संबंधी समस्या तक सीमित नहीं हैं। भारत के चीन विशेषज्ञ उनसे निपटने में ज्यादा काबिलियत नहीं दिखा सके। इस थके-हारे विचार को बार-बार दोहराने की आदत छोड़ ही दी जानी चाहिए कि दुनिया में भारत और चीन, दोनों के साथ-साथ उभरने की पूरी गुंजाइश है। देवयानी खोबरागडे के मामले ने अमेरिका के साथ हमारे संबंधों की पोल खोल ही दी है। अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते हमारी सामरिक प्राथमिकता अवश्य हैं, लेकिन क्या हमारे पास ऐसी कूटनीतिक क्षमता है कि अमेरिका को यह अहसास कराया जा सके कि देवयानी का मामला हमारे आत्मसम्मान का प्रश्न है और अगर भारत सख्त जवाबी कार्रवाई करता है तो अमेरिका को इसे समझना होगा।

[लेखक विवेक काटजू, विदेश मामलों के विशेषज्ञ हैं] 

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मोदी को कितनी चुनौती 'आप' की?

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राजनीति में मुख्य रूप से दो प्रकार के गणित होते हैं। एक वास्तविक गणित और दूसरा अवधारणात्मक गणित। राजनीतिक जानकार इन दोनों ही आधार पर किसी पार्टी या नेता की लोकप्रियता का मूल्याँकन करते रहते हैं। ज़रूरी नहीं कि जो अवधारणा हो वैसा ही नतीजा हो और जैसा नतीजा हुआ है उसके आधार पर नई अवधारणा के लिए कोई गुज़ाइश न हो। कई प्रकार के अपवाद हैं।

अरविंद केजरीवाल के उदय से और आम आदमी पार्टी के लोक सभा चुनाव में उतरने के एलान से अवधारणात्मक गणित में एफ नया फ़ैक्टर आ गया है । दिल्ली से संचालित मीडिया स्पेस में मोदी के बराबर अरविंद को जगह मिलने लगी है। बीजेपी हो सकता है कि अपना ध्यान क्षेत्रीय मीडिया स्पेस पर लगाये लेकिन अरविंद वहाँ भी पहुँच सकते हैं । इसलिए दोनों के लिए इस वक्त नया मीडिया स्पेस तलाशने से कोई फायदा नहीं है । स्पेस के लिहाज़ से अवधारणात्मक गणित बनाने का मंच राष्ट्रीय मीडिया ही है। अख़बारों के ज़िला संस्करण अवधारणा बनाने के सशक्त उपकरण नहीं हैं । वे भी राष्ट्रीय मीडिया के विस्तार हैं । उनकी भूमिका से इंकार नहीं कर रहा लेकिन ज़िला संस्करण भी भाषणों से राष्ट्रीय तत्वों का ही चयन करता है। 

तो क्या आम आदमी पार्टी मोदी को चुनौती देगी? इसका सरल जवाब है। चुनौती तो देगी मगर दे नहीं पायेगी। कारण यह है कि अवधारणात्मक गणित में मोदी काफी आगे निकल चुके हैं। आप दिल्ली की तरह हर जगह कांग्रेस का ही विकल्प बनेगी। वह यूपी में सिर्फ मोदी से नहीं लड़ पायेगी। उसे अखिलेश यादव और मायावती से भी लड़ना होगा। दिल्ली में एक ही टारगेट था। आप को मिलने वाला हर वोट मोदी की जीत को पक्का करेगा। दिल्ली के नतीजे यही बताते हैं। दिल्ली में बीजेपी भले नहीं जीत पाई मगर वो हारने से इसलिए बच गई क्योंकि मोदी ने बचा लिया। वर्ना आम आदमी पार्टी के सामने कांग्रेस की तरह बीजेपी भी पंद्रह बीस सीटों वाली बन कर रह जाती। दिल्ली के उदाहरण से बीजेपी को बौखलाना नहीं चाहिए। आप भले ही मोदी को निशाना बनाएगी क्योंकि पहले के लेख में भी कह चुका हूँ कि अवधारणात्मक ज़मीन पर मोदी ही नंबर वन हैं। वहाँ आप दूसरे या तीसरे नंबर के मनमोहन सिंह या कांग्रेस को टारगेट कर उसे लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन क्या बीजेपी को भी आप को नम्बर वन टारगेट समझना चाहिए? क्या बीजेपी आप को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम उठा सकेगी? जीत के प्रति आश्वस्त होने के बावजूद।

यह सही है कि आप की कामयाबी ने राजनीतिक चर्चा को बदल दिया है। यह भी सही है कि आप की टीम तीन सौ ज़िलों में मौजूद है। लेकिन वे तीन सौ ज़िले दिल्ली नहीं हैं। उनमें से कई ज़िले ज़रूर हो सकते हैं । कई शहर हो सकते हैं। दिल्ली में ही आप के लिए देश भर से वोलिंटियर काम करने आ गए थे। क्या आप यही रणनीति हर जगह पर दोहरा पाएगी? इंडियन एक्सप्रेस में योगेंद्र यादव का इंटरव्यू दिलचस्प है। आख़िर में योगेंद्र ने कहा है कि काश हम चुनाव आयोग से कह पाते कि लोक सभा चुनाव एक साल के लिए टाल दीजिये। 

हाँ यह ज़रूर है कि आप ने अवधारणात्मक ज़मीन पर की जाने वाली गणित में मोदी का खेल बिगाड़ दिया है। मोदी पर अरविंद का हमला ज़्यादा आक्रामक और विश्वसनीय सा लगेगा। कांग्रेस आज दिल्ली में एंटी करप्शन यात्रा कर रही है। किसी चैनल पर यह फ़्लैश देखा है। यह महज़ नौटंकी है। आप की तरह रंग बदल कर कांग्रेस बीजेपी आप नहीं हो सकती । इससे लाभ आप को ही मिलेगा। लेकिन कांग्रेस से ज़्यादा फायदा बीजेपी को मिल सकता है। कांग्रेस जितना भ्रष्टाचार के विरोध को लेकर मुखर होगी आप की डुप्लीकेट लगेगी। इससे उसका वोटर आप में बँटेगा और कई शहरी क्षेत्रों में बीजेपी की तरफ़ जायेगा। तो जैसा मैं कह रहा था कि अवधारणात्मक गणित में अरविंद को नंबर तो मिलेंगे क्योंकि जानकार दिल्ली की तरह छह सीटें देने की ग़लती दोबारा नहीं करेंगे। आप को इस बार ज़्यादा सीटें देंगे। जिसके कारण अरविंद मोदी की दावेदारी को अपने सवालों से अवधारणात्मक चुनौती देने लगेंगे। कुमार विश्वास का यह बयान तुकबंदी नहीं है कि अगर मोदी वैचारिक रूप से वंशवाद के इतने ही ख़िलाफ़ हैं तो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ क्यों नहीं लड़ते। यह चुनौती कांग्रेस या लेफ़्ट की तरफ़ से नहीं आ सकता। मोदी भले ही चुप हो जाएँ मगर पब्लिक को तर्क के लिए ही सही एक नया मसाला तो मिल ही गया। 

इसीलिए नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं होगा कि वे आप को नज़रअंदाज़ करें। आप के खाते में गए लोग कांग्रेस और बीजेपी स़े निकले हुए हैं। मोदी ने शुरू से ही पहली बार मतदाता बने युवाओं को ज़्यादा टारगेट किया है और उनमें अपनी पकड़ ज़रूर बनाई है। मोदी ने उन्हें इसलिए टारगेट किया कि ये नए लोग हैं। इनकी निष्ठाएँ नईं हैं। यो बीजेपी की कमज़ोरियों से कम वास्ता रखते हैं इसलिए नेतृत्व की मज़बूत दावेदारी को फिर से उभारा गया जिसे दो दो बार आडवाणी जी सामने लाकर कमज़ोर मनमोहन से हार गए। मोदी ने इस पिटे हुए फ़ार्मूले को युवाओं के बीच ले जाकर लोकप्रिय बना दिया। अब अरविंद के आने से पहली बार मतदाता बने युवाओं के बीच मोदी और अरविंद में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा होने जा रही है। पार्टियों की निगाह में यह पहली बार मतदाता ज़्यादातर शहरी और पब्लिक स्कूल वाला है। इनके बीच से एक वोटर का भी मोदी से अरविंद की ओर जाना नुक़सान तो होगा ही। फिर भी यह बात अवधारणात्मक स्तर पर ही ज़्यादा प्रबल लगती है। वास्तविक गणित के धरातल पर कमज़ोर। 

अगर टीवी और सोशल मीडिया को यह श्रेय दिया जा रहा है कि आप इनकी पैदाइश है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी काल्पनिक मीडिया के असर के कारण बीजेपी में मोदी की दावेदारी प्रखर हुई थी। मोदी की टीम ने भी इसे काफी प्रचारित किया था कि टीवी वालों को टीआरपी आती है इसलिए मोदी को दिखाते हैं क्योंकि मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। इस तरह की बातें बीजेपी के कई नेताओं ने डिबेट शो में कहीं हैं। वे यह भूल गए कि टीवी को सनसनी, स्पीड न्यूज़ और क्रिकेट से भी टीआरपी मिलती है। अरविंद के कारण भी मिल रही होगी ! इसलिए अब इस चरण पर आकर आप मीडिया के प्रभाव (विवादास्पद) को ख़ारिज नहीं कर सकते। 

ज़ाहिर है मोदी आगे हैं। उनके पास संगठन है। आप के पास वोलिंटियर की ताक़त तो है मगर हर जगह समान सघनता नहीं है। लेकिन जिस तरह से कई जगहों पर लोग आप की तरफ़ देख रहे हैं, बीजेपी आगे होते हुए भी इस नए फ़ैक्टर को अनदेखा नहीं कर सकती हैं। शहरीकरण के प्रसार को मोदी की कामयाबी से जोड़ा जा रहा था। इसमें एक और दावेदार आ गया है जो नया और आकर्षक है। दिल्ली की सात सीटों के अलावा आस पास की कुछ सीटों पर आप की मौजूदगी दस बीस तो हो ही जाती है। आगरा, कानपुर, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, पुणे, फ़रीदाबाद, गुड़गाँव, भिवानी, बंगलुरू जैसी सीटें। क्या बीजेपी ऐसी पंद्रह सीटों को अनदेखा करने का जोखिम उठा सकती है? हाँ अगर गडकरी अरविंद पर हमला करते हैं तो ज़रूर फ़ायदा आप को होगा। देखते हैं नरेंद्र मोदी कब तक आप या अरविंद को नज़रअंदाज़ करते हैं। मोदी के लिए मिशन 272 के लिए एक एक सीट ज़रूरी है। पहले तो उन्हें वाजपेयी के 186 सीटों का रिकार्ड तोड़ना है फिर मनमोहन सिंह से बड़ा नेता (२००९ के अनुसार) बनने के लिए 206 से ज़्यादा सीटें लानी हैं इसलिए वास्तविक गणित का वक्त आने से पहले अवधारणात्मक गणित की कापी पर काट पीट और बढ़ जाएगी।

 
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