संपादकीय

सभ्य समाज की असभ्यता


आशिमा
पिछले दिनों कनाडा पुलिस ने दुनिया भर में बाल यौन शोषण में लिप्त एक गिरोह का पर्दाफाश किया। उसने कई देशों के शिक्षक, डॉक्टर और अभिनेताओं समेत करीब 350 लोगों को गिरफ्तार किया और 386 बच्चों को मुक्त करवाया। कनाडा पुलिस मामले की 2010 से ही जांच कर रही थी। उसने इंटरपोल, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, मेक्सिको, नॉर्वे और ग्रीस सहित 50 से भी अधिक देशों के साथ मिलकर काम किया। अधिकारियों ने हजारों की संख्या में बच्चों के अश्लील विडियो बरामद किए।
जाहिर है ऐसे गिरोह का पकड़े जाना अपने आप में एक बहुत बड़ी कामयाबी है, लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ी गंभीर समस्या भी सामने आई है। जितने आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, और जितने बच्चों को छुड़ाया गया यह कोई छोटी संख्या नहीं है। सोचा जा सकता है कि कितने बच्चों के साथ बहुत बड़े पैमाने पर दुष्कर्म हो रहा होगा। आज के दौर में बच्चों पर सबसे बड़ा खतरा इसी अपराध का है। बहरहाल गूगल और माइक्रोसॉफ्ट मिलकर ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं जिससे इंटरनेट पर बच्चों की अश्लील सामग्री को धीरे-धीरे खत्म किया जा सके।
इसे पश्चिम की समस्या समझ कर छोड़ नहीं देना चाहिए क्योंकि अपने देश में भी कितनी ही ऐसी खबरें आतीं हैं। हमारे महानगरों से, जहां कथित रूप से पढ़ा-लिखा और जागरूक वर्ग रहता है, बीते दिनों दिल दहला देने वाली खबरें सामने आईं। एक एयर होस्टेस ने घर में काम करने वाली बच्ची को असहनीय शारीरिक प्रताड़ताएं दीं, उससे भी पहले के समय में जाएं तो एक डॉक्टर दंपती खबरों में था, जिन्होंने एक बच्ची को घर में काम करने के लिए रखा था। उसे वे घर में बंद करके जाते थे, खाने तक को तरसाते थे, मारने पीटने का तो हिसाब ही नहीं। ऐसी कुंठित और बीमार मानसिकता आखिर कहां से जन्म ले रही हैं, जो बच्चों तक को नहीं बख्श रहीं? और यह सब भी तब है, जब 14 साल से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखने पर पाबंदी है।
आखिर रुतबे वाले लोगों में इतनी हिम्मत आती कहां से है कि वे इस कानून का उल्लंघन करें, और ऊपर से काम पर रखने के साथ-साथ उनको शारीरिक प्रताडऩाएं दें? इसका सबसे पहला जवाब यह हो सकता है कि बच्चे मासूम और निरीह होते हैं, इसलिए वे बड़े लोगों का बराबरी की ताकत से विरोध नहीं कर सकते और आसानी से डराये और धमकाए जा सकते हैं। इसलिए सस्ती लेबर का साधन अब तक बच्चे ही देखे गए हैं जिन्हें न केवल डरा कर बल्कि बिना किसी मेहनताने के आसानी से काम करवाया जाता है।
इसके साथ ही मानव तस्करी भी जोरों पर है, जिसके सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं और बच्चे होते हैं। अखबारों में प्राय: किसी न किसी दिन बच्चों के गायब होने की खबरें आम हो गईं हैं। निठारी कांड अब भी हमारे जेहन में ताजा है। बलात्कार और दुष्कर्म की खबरें सो अलग। महानगरों से हटकर यदि ये ही बच्चे किसी गैर कानूनी संगठनों के हाथ लग गए तो स्थिति और भी बदतर होती है, क्योंकि कई आतंकवादी संगठनों में इन्हीं कोमल हाथों में बंदूक थमा कर तबाही का पाठ पढ़ाया जाता है। यह बात भी जग जाहिर है कि चाइल्ड पॉर्न के गोरखधंधे में सबसे ज्यादा तीसरी दुनिया के बच्चों का इस्तेमाल होता है।
पंचवर्षीय योजनाओं में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर कार्यक्रम चलाए गए हैं। सरकार योजनाओं में बच्चों के हालात के प्रति जागरूक नजर आती है। पर व्यवहार में कुछ और है। दरअसल इस मामले में दोहरा रवैया अपनाया जाता है। संपन्न तबके के बच्चों को तो सभी सहूलियतें हासिल हैं पर गरीब बच्चों को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। बच्चों के लेकर कोई आवाज भी नहीं उठाई जाती। इसलिए सरकार पर कोई दबाव नहीं बन पाता। अगर वाकई सरकार अपने को लोक कल्याणकारी कहती है तो उसे सभी वर्गों के बच्चों पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए।
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