विशेष रिपोर्ट

श्रीमान अजीत जोगी को उनके जन्म व आगामी निर्वाण दिवस पर सादर नमन व उनके जीवन व कार्य पर समीक्षा

श्रीमान अजीत जोगी को उनके जन्म व आगामी निर्वाण दिवस पर सादर नमन व उनके जीवन व कार्य पर समीक्षा

 प्रभाकर ग्वाल

मौके तो बहुत आये, पर हाँथ बंधे थे। जब भी कुछ अच्छे करने की बारी आई, हर जातीय अहंकार ने हैसियत को कम कर दिया। अन्ततः प्रथम मुख्यमंत्री श्रीमान अजित जोगी ने समाजवादी विचारधारा के होने के बावजूद पूंजीवादी व समाजवादी विचारधारा के मध्य चलते वे सब कुछ नही कर पाए जो करना चाहते थे। 

बिना राग द्वेष के भविष्य के रणनीतिकारों के लिए श्रीमान अजित जोगी के कार्य की समीक्षा कर, यदि भूल मानते हैं तो, ऐसे भूल न करें यदि असफलता मानते हैं तो असफलता के कारण को दूर करने का प्रयास करे। 

श्रीमान अजित जोगी स्वयं में सफल इंसान रहे हैं। इनकी रणनीतिक भूल सबसे पहले जब रायपुर कलेक्टर रहे तो महासमुंद के कोडार बांध निर्माण के बाद इस्तीफा देने के बाद हुई। 

फिर चुनाव में जाति विवाद की रणनीतिक भूल हुई। शायद जनरल सीटों से चुनाव लड़ते तो ऐसे विवाद न होता । 

कांग्रेस के रणनीतिकारों ने श्री अजित जोगी जी को आरक्षित सीट से चुनाव लड़ाकर स्थायी गुलाम बना दिये, जिसका ये प्रभाव रहा है कि नए पार्टी बनाने व उनके मृत्यु के बाद उनके वारिसों को भी आज डस रही हैं। 

मरवाही उपचुनाव में दादागिरी पूर्ण कार्य करते हुए चुनाव फार्म भी स्वीकार नहीं किया गया। इससे बढ़ी राजनीतिक अत्याचार नही हो सकता है। 

ये समस्या है तो जैसे कि सबको मालूम है, समस्याओं का कारण व समाधान भी हैं, पर जीते जी श्री अजीत जोगी हल करने प्रयास नही किये, बल्कि इसी समस्या स्वयं मुद्दा बनाकर आगे बढ़ने की असफल कोशिश किये। 

श्री अजीत जोगी के 3 साल के शासनकाल में आम जनता की हर समस्या चाहे थाना की हो या तहसील या कलेक्टर की हो सभी सुनी व राहत भी दी जाती थी। 

फिर जैसे जैसे अजीत जोगी के पुत्र श्री अमित जोगी का राजनीतिक में दखल बढ़ते गया, अजीत जोगी को अमित जोगी को नियंत्रण करने के बजाय उपेक्षा की जाने लगी। 

बहुत बड़ी घटनाओं पर गैर जिम्मेदारी बयान दिया गया या वायरल किया गया, जिसका समुचित उत्तर या बचाव नही किया जा सका । 

जैसे रामावतार जग्गी हत्याकांड अजीत जोगी परिवार का हाँथ न होते हुए भी, अनावश्यक दोनो पिता पुत्र अभियोजित हो गए। 

फिर झीरमघाटी हत्याकांड के बाद मध्यप्रदेश के एक भाजपा सांसद ने तत्काल मीडिया में व्यान जारी किया कि नक्सली हमले में अजित जोगी का हाँथ हैं। 

जबकि झीरमघाटी हत्याकांड के बारे जोगी सोच भी नही सकते, यदि ऐसे होने की सम्भावना की भी जानकारी भी होती तो 15 दिन पहले  किसी अस्पताल में भर्ती हो जाते, सुकमा के मीटिंग में नही जाते। 

चाहकर भी राष्ट्रपति शासन लगाकर रमन सरकार को बर्खास्त कर दो महीने में झीरमघाटी की जांच की सच्चाई सबके सामने ला सकते थे। 

पर यहाँ राहुल गांधी ने आकर सारे तत्कालीन प्रतिरोध को शांत कर दिये, झीरमघाटी के तत्काल बाद ही राहुल गांधी के वक्तव्य को एक फिर सुनिए ओ अभी Himanshu Kumar  से वीडियो स्टेट मेन्ट को सुनिए। 

बार बार कांग्रेस का हार जाने के कारण को सबने अमित जोगी, अजीत जोगी के भीतर घात को दिये। 

इस संबंध में 25 दिसम्बर 2015 को अजीत जोगी, अमित जोगी व रमन सिंह परिवार के साथ अंतागढ़ उपचुनाव में सौदेबाजी का ऑडियो भी वायरल किया गया था। 

इसी दिन मुझे मेरे पद अधिकार को प्रभावित करने के लिए सुकमा जिले के तत्कालीन कलेक्टर नीरज बंसोड़ के द्वारा सुकमा मजिस्ट्रेट को आदेश पारित कराने के लिए राय लेने का ऑडियो भी वायरल हुआ था। 

श्री अजीत जोगी के प्रभाव काल विश्व की एक फेमस डायलॉग विडियो के साथ वायरल हुआ था कि ""पैसा खुदा तो नही हैं, पर पैसा खुदा से कम भी नहीं है""

जिसमे डायलॉग बोलने वाले पर कम बल्कि अमित जोगी पर अधिक कार्यवाही हुई, जो अंत मे एक निष्पक्ष निश्कर्ष तक नही पहुंच पाया। डायलॉग बोलने वाले श्री तत्कालीन भाजपा सांसद दिलीप सिंह जूदेव इस वीडियो के बाद हर राजनीतिक दावे से पिछड़ने लगे । 

श्री अजीत जोगी की सबसे बड़े निर्णय पर ये रही सबसे समीक्षा । 

कि अन्ततः श्री जोगी ने नए दल बनाकर चुनाव लड़े, बसपा के साथ गठबंधन भी किये। 

कुछ लोगों का मानना है कि गठबंधन के कारण जोगी के दल को लाभ तो हुआ, पर बसपा को लाभ नही हुआ। 

यहां सबसे बड़ी समीक्षा ये हैं कि जब तक अजीत जोगी का राजनीतिक प्रभाव रहा है, हमेशा बसपा को छुप कर व खुले रूप में बसपा को नुकसान पहुंचाए हैं। 

चाहे कार्यकर्ता तोड़ना हो या सारंगढ विधायक छविलाल रात्रे को तोड़ना हो। 

भाजपा विधायकों सत्ता के प्रभाव आते ही तोड़ देना, निजीकरण को बढ़ावा देना जैसे परिवहन निगम को खत्म करना, शिक्षकों नियमित नही करना, शिवनाथ नदी के पानी को उद्योपतियों को देना। 

अंत मे आप सबसे बड़ी विनम्र निवेदन के साथ रणनीतिक व भविष्य के रचनात्मक समीक्षा मेरे दृष्टि में ये हैं कि छत्तीसगढ़ में नए या सामाजिक स्तर पर गठबंधन दल बनाना बहुत ही गलत निर्णय होगा। 

क्योंकि हम कितनी भी कोशिश करें 10 साल के भीतर भाजपा, कांग्रेस के समर्थकों को 15-15% से कम नही कर सकते हैं, ये लोग मर भी जाएंगे पर आरएसएस, भाजपा, कांग्रेस को नही छोड़ेंगे, कोई नही छोड़ते हैं। 

इतनी लंबी टूट फुट, बदनामी के बाद भी बाद भी बसपा का जनाधार कम नही हो रहा है । 

इस बीच छत्तीसगढ़ के परिपेक्ष्य में आम आदमी पार्टी, जोगी जी की पार्टी, फिर चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण की पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, हमारे आदिवासी भाइयों के द्वारा आपस मे राजनीतिक दल बना कर भी जनाधार बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका सीधा लाभ भाजपा व कांग्रेस को होगा। 

अतः अंतिम निवेदन कि आप सबमे थोड़ा भी इंसानी समझ हैं तो, जीत करीब पहुंच रही बसपा के लिए कार्य कीजिए, ताकि स्थायी रूप से निजीकरण को समाप्त कर, सामाजिक लोकतंत्र के साथ साथ आर्थिक, शैक्षणिक समानता सबको दिलायी जा सके। 

आप सबकी वैचारिक स्वतंत्रता का मैं स्वागत करता हूँ ।     

 प्रभाकर ग्वाल- पूर्व सीबीआई, मजिस्ट्रेट
 छत्तीसगढ़, 9479270390

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