विशेष रिपोर्ट

भूखमरी एवं अभाव में भारत का अग्रणी होना!

भूखमरी एवं अभाव में भारत का अग्रणी होना!

लेख : ललित गर्ग  

एक तरफ भारत को दुनिया में एक उभरती आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा है और दूसरी तरफ सबसे ज्यादा भूखे लोगों के देश के रूप में इसकी गिनती होती है, यह विरोधाभास मोदी सरकार के विकास एवं संतुलित समाज की संरचना  पर एक प्रश्न है। किसी भी देश में आम नागरिकों का स्वास्थ्य वहां के विकास की सचाई को बयां करता है। लोगों की सेहत की स्थिति इस बात पर निर्भर है कि उन्हें भरपेट और संतुलित भोजन मिले।

इस लिहाज से देखें तो विकास और अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ने के तमाम दावों के बीच भारत में अपेक्षित प्रगति संभव नहीं हो सकी है। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर जारी हुए ताजा भुखमरी सूचकांक 2019 के आंकड़ों में भारत की स्थिति काफी दुखद, त्रासदीपूर्ण एवं चिंताजनक है। दुनिया के एक सौ सत्रह देशों की सूची में भारत को एक सौ दो नंबर पर जगह मिल सकी है। जबकि पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान और बांगलादेश को इस सूची में बेहतर जगह मिली है। यह कैसा विकास है? यह कैसे आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होते कदम है? भूख, अभाव, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, बेरोजगारी की त्रासदी को जी रहा देश कैसे विकसित राष्ट्रों में शुमार होगा, कैसे विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बनेगा?

कहीं-ना-कहीं हमारे विकास के माॅडल में खामी है या वर्तमान सरकार की कथनी और करनी में फर्क है। ऐसा लगता है कि हमारे यहां विकास के लुभावने स्वरूप को मुख्यधारा की राजनीति का मुद्दा बनाने एवं चुनाव में वोटों को हासिल करने में तो कामयाबी मिली है, लेकिन इसके बुनियादी पहलुओं को केंद्र में रखकर जरूरी कदम नहीं उठाए गए या उन पर अमल नहीं किया गया। यह बेवजह नहीं है कि नेपाल, पाकिस्तान और बांगलादेश जैसे पड़ोसी देश भी इस मामले में हमसे बेहतर स्थिति में पहुंच गए, जो अपनी बहुत सारी बुनियादी जरूरतों तक के लिए आमतौर पर भारत या दूसरे देशों पर निर्भर रहते हैं।

साफ है कि हमारी प्रगति की तस्वीर काफी विसंगतिपूर्ण है और इससे उस सच्चाई की पुष्टि होती है जिसे अक्सर इंडिया बनाम भारत के मुहावरे में व्यक्त किया जाता है। ताजा रिपोर्ट भारत की एक बड़ी जनसंख्या की बदहाली का अकेला सबूत नहीं है। खुद देश में सरकार एवं अन्य एजेन्सियों की तरफ से कराए गए सर्वेक्षण और कई दूसरे अध्ययनों के जरिए कंगाली, भुखमरी और कुपोषण के दहलाने वाले आंकड़े समय-समय पर विकास की शर्मनाक तस्वीर प्रस्तुत करते रहे हैं।

यों ऐसे हालात लंबे समय से बने हुए हैं कि एक ओर रखरखाव के पर्याप्त इंतजाम और जरूरतमंदों तक पहुंच के अभाव में भारी पैमाने पर अनाज सड़क, खेतों एवं खुले स्थानों पर बर्बाद हो जाता है, दूसरी ओर देश में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है, जिन्हें पेट भरने लायक भोजन नहीं मिल पाता। इस मसले पर एक बार सुप्रीम कोर्ट को यहां तक कहना पड़ा था कि गोदामों में या उनके बाहर सड़कर अनाज के बर्बाद होने से अच्छा है कि उसे गरीबों में मुफ्त बांट दिया गया। लेकिन इस तल्ख रूख के बावजूद न सरकारों का रूख बदला, न इस मामले पर कोई नीतिगत कदम उठाये गये हैं। आज भी नीतियों और व्यवस्थागत कमियों की वजह से भारी पैमाने पर अनाज की बर्बादी होती है और कहीं बहुत सारे लोगों की थाली में जरूरत भर भी भोजन नहीं पहुंच पाता। अफसोस की बात है कि विकास के ब्योरों में इस समस्या को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।

यही वजह है कि जब विकास की संपूर्ण तस्वीर का आकलन होता है तो उसमें हमारा देश काफी पीछे खड़ा दिखता है, जबकि अर्थव्यवस्था के साथ-साथ अन्य कसौटियों पर अपेक्षकृत कमजोर माने वाले हमारे कुछ पड़ोसी देशों ने इस मसले पर एक निरंतरता की नीति अपनाई और अपनी स्थिति में सुधार किया। दुनिया में भुखमरी बढ़ रही है और भूखे लोगों की करीब 23 फीसदी आबादी भारत में रहती है।

   संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भुखमरी के कारणों में युद्ध, संघर्ष, हिंसा, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा आदि की तो बात करती है लेकिन नवसाम्राज्यवाद, नवउदारवाद, मुक्त अर्थव्यवस्था और बाजार का ढांचा भी एक बड़ा कारण है, अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ता फासला आदि की चर्चा नहीं होती। भारत की अर्थव्यवस्था की एक बड़ी विसंगति यह रही है कि यहां एक तरफ गरीब है तो दूसरी तरफ अति-अमीर है। इन दोनों के बीच बड़ी खाई है। इस बढ़ती खाई पर ज्यादा शोरशराबा नहीं होता तो इसकी एक वजह यह भी है कि मान लिया गया है कि उच्च वर्गों की समृद्धि की रिसन या ऊंची विकास दर के जरिए गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य अपने आप पा लिया जाएगा। यह उम्मीद पूरी तरह भ्रामक है और पूरी होती नहीं दिखती। उलटे विश्व खाद्य कार्यक्रम की रिपोर्ट बताती है कि सरकारों द्वारा निर्धारित अनाज की ऊंची कीमतों के चलते दुनिया में साढ़े सात करोड़े वैसे लोग भुखमरी की चपेट में आ गए हैं जो पहले इससे ऊपर थे। भूखे या अधपेट रह जाने वाली जनसंख्या में हुए इस इजाफे में तीन करोड़ लोग केवल भारत के हैं। इसमें पीने के पानी, कम से कम माध्यमिक स्तर तक शिक्षा और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के अभाव को जोड़ लें तो हम देख सकते हैं कि भारत आजादी के सात दशक बाद भी असल में वंचितों की दुनिया है।

अमीरी-गरीबी के बीच की दूरियां मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों से भी दूर होती हुई नजर नहीं आ रही है। आशा की गयी थी कि मोदी सरकार की नीतियां आर्थिक विसंगतियों को समाप्त करने का माध्यम बनेंगी, आशा तो अभी भी है, लेकिन विकास योजनाओं एवं आर्थिक नीतियों से गरीबी एवं अभाव मंे जीने वाले लोगों के जीवन में उजाला होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। जीवन के आसपास गुजरते अनुभवों की सत्यता यही है कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी गरीबी, अभाव, भूखमरी में घुटा-घुटा जीवन जीता है, जो परिस्थितियों के साथ संघर्ष नहीं, समझौता करवाता है। हर वक्त अपने आपको असुरक्षित-सा महसूस करता है। जिसमंे आत्मविश्वास का अभाव अंधेरे में जीना सिखा देता है। जिसके लिए न्याय और अधिकार अर्थशून्य बन जाता है।

एक तरफ भूखमरी तो दूसरी ओर महंगी दावतों और धनाढ्य वर्ग की विलासिताओं के अम्बार, बड़ी-बड़ी दावतों में जूठन की बहुतायत मानवीयता पर एक बदनुमा दाग है। इस तरह व्यर्थ होने वाले भोजन पर अंकुश लगाया जाए, विज्ञापन कंपनियों को भी दिशा निर्देश दिए जाएं, होटलों और शैक्षिक संस्थानों, दफ्तरों, कैंटीनों, बैठकों, शादी और अन्य समारोहों और अन्य संस्थाओं में खाना बेकार न किया जाए। इस भोजन का हम अपने समाज की बदहाली, भूखमरी और कुपोषण से छुटकारे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सरकार के भरोसे ही नहीं, बल्कि जन-जागृति के माध्यम से ऐसा माहौल बनाना चाहिए। आखिर में खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम अशांत, अस्थिर, हिंसक और अस्वस्थ समाज चाहते हैं या उसे बदलना चाहते हैं? क्या हम भूखमरी में अव्वल राष्ट्र के नागरिक होना चाहते है या खुशहाल एवं साधन-सम्पन्न नागरिकों के राष्ट्र के नागरिक?

भुखमरी और गरीबी मिटाने के लिये जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है वह हमारी शासन व्यवस्था में सिरे से नदारद है। लोकतांत्रिक दबाव के चलते जनकल्याण की कुछ योजनाएं जरूर चलाई जाती है, पर वे हर तरह की अनियमितता की शिकार रही है और हाशिये पर जी रहे लोगों का सहारा बनने से ज्यादा दूसरे लोगों की झोली भरने के काम आती है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि देश में सबसे ज्यादा अनियमितताएं उन्हीं गरीबी उन्मूलन नीतियों, सेवाओं और योजनाओं में है जिनका वास्ता समाज में कमजोर तबकों से होता है। एक बड़ा तकाजा इस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का है। दूसरे, नीतिगत स्तर पर भी हमें नए सिरे से सोचना होगा। भुखमरी और गरीबी मिटाने के कार्यक्रम खैरात बांटने की तरह नहीं चलाए जाने चाहिए, बल्कि उनकी दिशा ऐसी हो कि गरीबी रेखा से नीचे जी रहे लोग स्थायी रूप से उससे ऊपर आ सकें। यह तभी हो सकता है जब इन योजनाओं का मेल ऐसी अर्थनीति से हो जो विकास प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने पर जोर देती है।

More Photo

    Record Not Found!


More Video

    Record Not Found!


Related Post

Leave a Comments

Name

Contact No.

Email