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पंकिल राजनीति का एक पंकज : बिसाहूदास महंत

         पंकिल राजनीति का एक पंकज : बिसाहूदास महंत

देवधर महंत के फेसबुकवाल से......

मैं हिंदी का एक अकिंचन विद्यार्थी हूं । पद का एक अर्थ ओहदा ( Designation) होता है ,वहीं पद का एक अर्थ पैर (Foot) भी होता है । पद क्या किसी कद्दावर के कद से बडा हो सकता है ?  क्या भारत का कोई भी पद  महात्मा गांधी जी , नेताजी सुभाषचंद्र बोस,  जयप्रकाशनारायण के कद की बराबरी कर सकता है ? कुछ लोग पद के कारण पूजे जाते हैं । लेकिन कुछ लोग ऐसे भी  होते हैं ,जिनके कारण कोई पद गौरवान्वित होता है ।  बिसाहूदास महंत  इसी श्रेणी के थे ।

      आज कोई अपनी  दबंगता से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन लेता  है , तो कोई मुख्यमंत्री नहीं बन पाने के कारण सरकार गिरा  देता है । लेकिन बिसाहूदास महंत ऐसे राजनीतिज्ञ थे ,जो चाहते तो सन्  1967  में ही उप मुख्य मंत्री बन जाते ।   संविद के मुख्यमंत्री रहे गोविंदनारायणसिंह महंत जी के घनिष्ठ मित्र थे । वे महंत जी से मंत्रणा करने और आफर देने इनके गृह ग्राम सारागांव भी  पधारे थे और  रात्रि विश्राम भी  किये थे । ये चाहते तो स्वयं मुख्यमंत्री पद का दावा  भी ठोंक सकते थे ,क्योंकि 1967 में इनके समर्थक /  मित्र विधायकों की संख्या बहुतायत थी । 1969 में संविद सरकार के पतन के बाद जब कांग्रेस विधायक दल के नेता पद का चुनाव हुआ था तो पं. श्यामाचरण शुक्ल के खिलाफ कुंजीलाल दुबे प्रत्याशी थे ।

उस समय अपने समर्थक विधायकों के साथ महंत जी ने  शुक्ल जी का समर्थन किया था । यही कारण है कि महंत जी  को 9 अप्रैल 1969 को सीधे लोक निर्माण विभाग का केबिनेट मंत्री बनाया गया । बाद में मंथरा प्रवृत्ति के लोगों ने शुक्ल जी के कान भरने का काम किया और महंत जी का विभाग बदल दिया गया और ये

जेल मंत्री बना दिये गये । सेठी सरकार में ये पहले श्रम ,पुनर्वास और हरिजन कल्याण मंत्री रहे । बाद में इन्हें वाणिज्य ,उद्योग और नैसर्गिक साधन मंत्री बनाया गया । सन् 1973 में दैनिक नवभारत के फ्रंट पेज में एक

तहलका मचानेवाली  बाक्स न्यूज छपी थी ? " मध्यप्रदेश के बरकतुल्ला ?"। जिसमें महंत जी के मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के कयास लगाये गये थे।   उसी समय राजस्थान में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे  मोहनलाल सुखाडिया को हटाकर  बरकतुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया गया गया था । महंत जी चाहते तो इंदिरा गांधी के समक्ष अपना दावा भी ठोंक सकते थे । इनसे  इंदिरा गांधी ने पूछा भी था कि क्या आप मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं ? लेकिन इन्होंने शालीनतापूर्वक  उत्तर  दिया था ऐसी कोई बात नहीं है। महंत जी तो किसी और ही मिट्टी के बने थे -कुछ लोग थे कि वक्त के सांचे में ढल गये । कुछ  लोग थे कि वक्त के सांचे बदल गये ।

              महंत जी को उनके विधान सभा के मतदाता उनकी सज्जनता और सहनशीलता के कारण किसी निजी काम ( तबादला आदि) के लिये अनाप -  सनाप भी कह देते थे । ये
चुपचाप सह लेते थे । लेकिन महंत जी उन्हें आत्मीय संबोधन देते हुये अपने  मधुर वार्तालाप से  शांत कर देते थे और बाद में  उनका काम भी करा देते थे । काम कराने की महंत जी की अपनी निजी विशिष्ट शैली थी । लेकिन एक बार प्रकाशचंद्र सेठी ने इनसे ऊंची आवाज में बात कर दी  तो महंत जी का  ( एक छत्तीसगढिया का ) स्वाभिमान जाग उठा ।इन्होंने अपने अन्य चार साथियों के साथ सेठी मंत्री मंडल से त्यागपत्र दे दिया । ये पांच मंत्री थे बिसाहूदास महंत , परमानंद भाई पटेल ,चंद्रप्रताप तिवारी , डा. टुमनलाल और झुमुकलाल भेंडिया । मध्यप्रदेश में राजनैतिक भूचाल आ गया ।   फिर तो इंदिरा जी  को हस्तक्षेप करना पडा । उनसे चर्चा उपरांत ही सेठी जी की ड्राफ्टिंग को ठुकराकर अपनी ड्राफ्टिंग के अनुसार , अपनी शर्तों पर  ये ससम्मान त्याग पत्र वापस लिये ।
    सन् 1977 में मध्यप्रदेश विधान सभा में कांग्रेस विपक्ष में आ गयी  । महंत जी को  नेता प्रतिपक्ष बनने के लिये  हाईकमान से  तथा उनके समर्थकों का दबाव आया लेकिन‌ इन्होंने अपने
स्वास्थ्य का हवाला देते हुये अपने बदले अर्जुनसिंह को नेता

प्रतिपक्ष बनवा दिया । और कुछ समय बाद 8 अगस्त1977 को प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष की जिम्मेदारी स्वीकार किये । आज भी उन घटनाक्रमों को महंत जी के अनन्य समर्थक रहे  तात्कालीन विधायक राधेश्याम शुक्ल बहुत  ही खूबसूरती के साथ   रहस्योद्घाटित करते हैं । वे  महंत जी को याद करते हुये द्रवित हो उठते  हैं।

        तब नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद ही आगे अर्जुनसिंह के भाग्योदय के पट  खुले । लेकिन अर्जुनसिंह का भी जवाब नहीं। ईमानदारी से दोस्ती और दुश्मनी  दोनों निभाना कोई उनसे सीखे । उन्होंने बडे दाऊ ( डा. चरणदास महंत ) को 1980 में विधान सभा का टिकट दिलाकर , कालांतर मे 1988 में अपने मंत्री मंडल में  कृषि राज्य मंत्री बनाकर और आजीवन पितृवत् स्नेह देकर तथा  अनेक प्रकार से उपकृत कर  स्वर्गीय बिसाहूदास महंत का  ऋण चुका दिया ।

       अपने छात्र जीवन में बिसाहूदास महंत मेधावी छात्र रहे हैं। साथ ही हाकी , फुटबाल ,व्हालीबाल और टेनिस के जबर्दस्त खिलाडी रहे हैं । ,प्रायमरी शिक्षा  के बाद  ये आगे की पढाई के लिये 1935 में शासकीय बहुउद्देशीय  उच्चतर माध्यमिक शाला बिलासपुर में प्रविष्ट  हुये। फिर 1942 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक उत्तीर्णकर उच्च शिक्षा के लिये  मारिस कालेज नागपुर गये । वहां भी प्रथम श्रेणी से बी. ए. उत्तीर्ण किये फिर विधि की डिग्री लिये । ये 1942 के भारत छोडो आंदोलन में  सक्रिय भाग लिये और जेल की यातना भी सहे ।न केवल हाई स्कूल बल्कि कालेज में भी  ये छात्रों के अगुवा  बने रहे । 1950 में ये नगरपालिका हाईस्कूल चाम्पा में प्रधानाध्यापक (तब प्रचार्य नहीं कहा जाता था ) बने । फिर 1952 के प्रथम आम चुनाव में मात्र 28 वर्ष की उम्र में विधायक बन गये ।फिर तो  इन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा । 1957 एवं 1962 में नवागढ विधान सभा क्षेत्र से बाद में 1967 ,1972  एवं 1977 में चाम्पा क्षेत्र से निरंतर विधायक निर्वाचित होते रहे । इनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ये 1977 की जनता लहर में भी ,वह भी अस्पताल दाखिल रहते हुये 4777 मतों से चुनाव जीत गये । महंत जी की अपने क्षेत्र में पकड , सांगठनिक क्षमता और   रणनीतिक कुशलता अद्वितीय थी ।

    इस खाकसार के परिवार से निकट रिश्तेदारी के अतिरिक्त महंत जी का अभिन्न संबंध रहा है ।  हमारे पितामह  तुलाराम महंत ,पिता बलरामदास महंत और मुझसे अर्थात् तीनों पीढियों से‌ महंत जी का पत्राचार रहा है । इनके कोई 28 दुर्लभ पत्र

आज हमारी धरोहर हैं । पिताजी  इनके समर्पित समर्थक और राजनैतिक सहयोगी  भी रहे हैं। महंत जी का उनसे ज्यादा पत्राचार रहा है । महंत जी का एक पत्र तो अंग्रेजी में हैं ,जिसमें
1967  में  पं. मिश्र सरकार के पतन के समय की घटनाओं

का संकेत  प्रदर्शित है । महंत  जी सहृदय साहित्य प्रेमी भी थे । छात्र जीवन से ही मेरी साहित्य सर्जना , पत्रकारिता तथा छात्र संघ की गतिविधियों से ये  प्रसन्न रहा करते थे और मुदित भाव से  "कविराज" संबोधित किया करते थे ।  साहित्यकार और पत्रकार पद्मश्री पं.  श्यामला्ल चतुर्वेदी ,  पत्रकार बी. आर. यादव जो कालांतर में विधायक और मंत्री बने ,से बार- बार पूछते रहते  थे कि "कविराज" का क्या समाचार है ?  1974 में प्रकाशित  मेरी पहली  छत्तीसगढी काव्य कृति "बेलपान"

के लिये इन्होंने अपना संदेश भेजा था । मेरे  महाविद्यालयीन छात्र संघ  अध्यक्ष बनने पर इन्होंने लिखित रूप से बधाई दी थी ।अपने एक अन्य पत्र में भी इन्होंने मेरा जिक्र भी किया है । यदि  स्वर्गीय महंत जी का  हृदयाघात से अल्पायु में निधन नहीं हुआ होता और  आज जीवित रहते तो राजनीति की  दिशा और दशा कुछ और ही  होती । ये छत्तीसगढ के स्वप्नद्रष्टा थे ।  नितांत व्यवहार कुशल , मित भाषी , निरभिमानी ,धैर्यवान लोक

संग्रही व्यक्तित्व के धनी थे ।   ये जनाराधन राजनीति के पुरोधा रहे ।आजीवन अपराजेय विधायक एवं  मंत्री तथा  प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष रहे ।लेकिन  अपनी  (निधनोपरांत )विरासत में मात्र 60 रूपये की स्वार्जित पूंजी छोडकर गये । राजनैतिक शुचिता के ये पर्याय थे ।

      मात्र  54 वर्ष 3 माह 22 दिन की अवधि  में स्वर्गीय महंत जी ने राजनीति के माध्यम से  जो जन सेवा की है , वह स्तुत्य है । 23 अप्रैल 1978 की सुबह 5. 25 बजे महंत जी अपनी पार्थिव काया को छोडकर पंचतत्व में विलीन हो गये और छोड गये रोते -विलखते  अपने परिवार को ,अपने अनुयायियों को , अपने  साथियों को ,अपने प्रेमियों को ।  बिसाहूदास महंत जैसे अजातशत्रु ,माटीपुत्र जननायक द्वारा मुदित भाव से  " कविराज " संबोधित इस खाकसार के उद्गार  इन्हें माटी देते हुये  सहसा फूट पडे थे -
" जिनके यश:काय का जग में कभी न होगा अंत । अमर  रहे  युग-युग  तक ,संत  बिसाहूदास महंत ।।"

देवधर महंत (93999-83585)
( लेखक की कृति " पुरुषो वै समुद्र: " का एक अंश) 

 

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