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शिवसेना का तंज- बीजेपी के साथ EVM साथ हो तो अमेरिका में भी खिल सकता है कमल

शिवसेना का तंज-  बीजेपी के साथ EVM साथ हो तो अमेरिका में भी खिल सकता है कमल

मुंबई : 

शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनकी पार्टी बीजेपी पर जमकर निशाना साधा गया है. सोमवार को छपे लेख में महाराष्ट्र की राजनीति से लेकर केंद्र की राजनीति तक पर फोकस किया गया है. शिवसेना ने सरकार 'गिराने' वाली संस्कृति पर भी हमला किया है और पूछा है कि बीजेपी की यह भाषा और कब तक चलेगी. संपादकीय की शुरुआत देवेंद्र फडणवीस और उनके उस दावे से की गई है जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र की कुल 48 में 43 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं.

संपादकीय में कहा गया है कि 'महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आत्मबल की जितनी प्रशंसा की जाए वो कम ही है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की उपस्थिति में पुणे में फडणवीस ने नारा दिया है कि ‘पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र में हमने 42 सीटें जीती थीं. इस बार हम किसी भी हालत में 43 सीटें जीतेंगे.’ फडणवीस का ऐसा भी दावा है कि इस बार हम बारामती में पवार का भी पराभव करेंगे.

 इस पर पवार ने अपने स्वभावानुसार भाजपा को शुभकामनाएं दी हैं. सच तो यह है कि महाराष्ट्र की कुल सीटों में से मतलब 48 सीटें ये लोग आसानी से जीत सकते हैं और देश में तो अपने बलबूते 548 सीटें तो कहीं नहीं गई हैं.‘ईवीएम’ और इस तरह झागवाला आत्मविश्वास साथ में हो तो लंदन और अमेरिका में भी ‘कमल’ खिल सकता है लेकिन उससे पहले अयोध्या में राम मंदिर का कमल क्यों नहीं खिला? इसका जवाब दो.'शिवसेना ने कहा है कि अयोध्या जैसे कई सवालों का जवाब उनके (बीजेपी) पास नहीं लेकिन ‘इसे गिराएंगे, उसे गिराएंगे, उसे गाड़ेंगे’ इस तरह की भाषा इन दिनों दिल्ली से लेकर गल्ली तक जारी है. गिराने की भाषा इनके मुंह में इतनी बस गई है कि किसी दिन ‘स्लिप ऑफ टंग’ होकर खुद के ही अमुक-तमुक लोगों को गिराएंगे, ऐसा बयान उनके मुंह से न निकल जाए. सत्ताधारी दल में जो संयम और विनम्रता का भाव होना चाहिए वो हाल के दिनों में खत्म हो चुका है.

सामना में लिखा है,  'एक तरह की राजनीतिक बधिरता का निर्माण हुआ है. यह मान्य है कि विरोधी दल बेलगाम होकर बोलता है, इसलिए सत्ताधारी दल भी इसी तरह बेलगाम होकर न बोले. महाराष्ट्र में शीत लहर के कारण फसलों पर बर्फ जम गई है. कई भागों में ओस की बूंदें जम गई हैं. उसी तरह सत्ताधारियों की बुद्धि भी ठंडी से जम गई है और राजनीति बिगड़ गई है, ऐसा कुछ हुआ है क्या? 

किसान आज संकट में है. सूखाग्रस्त महाराष्ट्र को केंद्र ने भी नजरअंदाज कर दिया. उन पर जोर से चिल्लाने की बजाय ‘इसे गिराओ, उसे गाड़ो’ ऐसा ही बयानबाजी हो रही है.'संपादकीय में लिखा गया है कि 'महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा युति का मामला अधर में अटका है. लेकिन ये स्थिति हमने नहीं पैदा की. बल्कि 2014 में इस पाप का बीजारोपण भाजपा ने ही किया था. सत्ता आती है और चली जाती है. लहर आती है और लहर खत्म हो जाती है. लोकतंत्र में दुर्घटनाएं होती रहती हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में दुर्घटना से राह निकालने का काम जनता को ही करना पड़ता है. 

पिछले 70 वर्षों में जनता ने यह कार्य बखूबी किया है. किसी दुर्घटना में मजबूत, कर्ता-धर्ता इंसान की स्मृति चली जाती है. उसी तरह किसी दुर्घटना में ‘झटका’ लगने के बाद उसकी स्मृति लौट आती है, ऐसा विज्ञान कहता है. सत्ता किसे नहीं चाहिए? राजनीति करनेवाले सभी लोगों को वह चाहिए लेकिन चौबीस घंटे उसी नशे में रहकर झूमना और नशे में डूबकर बोलना यह उचित नहीं.'

 

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