संपादकीय

चुनौतियों की तस्वीर

पिछले कुछ वर्षो में सामरिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए संप्रग सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रबंधन क्षमताओं में भारी कमी आने के साथ भारत का वाह्य वातावरण जटिल से जटिल होता जा रहा है। विदेश नीति के अहम मसलों पर समग्र आमसहमति कायम करने में सरकार की विफलताओं ने भी भारत के राष्ट्रीय हितों को चोट पहुंचाई है। पिछले साल यही बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों में उजागर हुआ और श्रीलंका के साथ रिश्तों के मामले में भी। बांग्लादेश के साथ संबंध तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के कारण प्रभावित हुए तो श्रीलंका से रिश्तों पर तमिल दलों के कारण ग्रहण लगा।

विदेश और सुरक्षा नीति को व्यवस्थित करने वाला संस्थागत ढांचा असंतुलित हो गया है। विदेश मंत्रालय के संदर्भ में अब यह नहीं कहा जा सकता कि वह सभी तरह की विदेश नीतियों को मजबूत करने के अपने बुनियादी उद्देश्य की पूर्ति में सक्षम है। विदेश मंत्रालय की यह भूमिका दिन-प्रतिदिन सिमटती जा रही है। उसे सुधारों की आवश्यकता है, लेकिन उसे अपना बुनियादी काम भी करने दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने न केवल विदेश मंत्रालय को अपने आवरण में ले लिया है, बल्कि उनकी छाया देश के विदेशी संबंधों के सभी पहलुओं पर पड़ रही है। इससे भी देश के हितों को नुकसान पहुंचा है।

आम चुनाव करीब आने के साथ राजनीतिक वर्ग के साथ-साथ आज जनता का ध्यान आंतरिक मुद्दों पर केंद्रित होगा। इसके फलस्वरूप विदेश नीति और सामरिक मामलों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाएगा। अगर चुनावों में विभाजित जनादेश सामने आता है तो अपने पड़ोस में होने वाली घटनाओं को प्रभावित करने की भारत की क्षमता भी घटेगी, क्योंकि विदेश नीति के मसलों पर घरेलू राजनीतिक दबाव हावी होंगे। इसके साथ ही पड़ोसी देश, विशेषकर पाकिस्तान महसूस करेगा कि भारत चूंकि आंतरिक प्रतिबद्धताओं में जकड़ा हुआ है इसलिए इस्लामाबाद उन मामलों में आसानी से आगे बढ़ सकता है जो भारत के हित को चोट पहुंचाने वाले हैं और उसे नई दिल्ली के पलटवार के खतरे का भी सामना नहीं करना पड़ेगा।

देश को 2014 में विदेश नीति और सामरिक दृष्टि से जिन मुख्य चुनौतियों का सामना करना होगा वे उसके आस-पड़ोस ही स्थित हैं। उत्तार में नेपाल से लेकर दक्षिण में मालदीव तक और पूरब में बांग्लादेश से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक भारत का पड़ोसी इलाका राजनीतिक अस्थिरता और बदलाव के दौर से या तो गुजर चुका है या गुजर रहा है। यह निराशाजनक है कि भारत मालदीव के मामले में अलग-थलग और अप्रभावी नजर आया। ऐसा ही कुछ अन्य देशों के संदर्भ में भी रहा। यह सही है कि पड़ोसी देशों की आंतरिक राजनीति में सीधी घुसपैठ से आमतौर पर बचा जाना चाहिए, लेकिन अपने देश के हितों को मजबूत करने के और भी तरीके होते हैं। भारत इन तरीकों का इस्तेमाल करने के मामले में नाकाम साबित हुआ है। नेपाल भारत की सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है और यह आवश्यक था कि भारत संविधान और देश के राजनीतिक भविष्य के लिए सभी दलों के बीच सहमति कायम करने में सफल रहता, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। बांग्लादेश के मौजूदा राजनीतिक ढांचे ने देश के हितों को भारत के साथ जोड़ने की कोशिश की, लेकिन संप्रग सरकार इलाकों की अदला-बदली के रूप में सीमा समस्या के अंतिम समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों को एक जगह लाने में नाकाम रही। ऐसा ही बांग्लादेश के साथ पानी के बंटवारे को लेकर भी हुआ और अब यह अनिश्चित है कि ऐसा मौका फिर आएगा कि नहीं?

2014 में भारत की विदेश और सुरक्षा नीति का असली इम्तिहान अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होगा। 2013 में इन संवेदनशील देशों के साथ भारत के संबंधों को दिशा देने के मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उनकी विदेश और सुरक्षा नीति टीम नौसिखिया साबित हुई। गत मई में नवाज शरीफ को उनकी चुनावी जीत के बाद गले लगाने की हड़बड़ी दिखाने की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन एक अभूतपूर्व घटनाक्त्रम में शरीफ के पदभार संभालने के पहले ही उन्हें मुबारकबाद देने के लिए एक खास दूत भेज दिया गया। स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान की सर्वशक्तिशाली सेना के नेतृत्व में वहां के सैन्य प्रतिष्ठान ने भारत के साथ दुश्मनी के पुराने रंग-ढंग नए सिरे से दिखाए तो नई दिल्ली के हाथ निराशा के अलावा कुछ नहीं लगा। शरीफ के सत्ता संभालने के बाद से ही सीमा तनाव का ठिकाना बनी हुई है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की ओर से ऐसे कोई संकेत भी नहीं मिले कि वह आतंकवाद के जरिये भारत को घाव देने की अपनी आदत-नीति त्यागने का इरादा रखता है।

नवाज शरीफ पाकिस्तान की विदेश नीति पर सिविलियन कंट्रोल स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसमें संदेह है कि सेना उन्हें भारत और अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के में संबंधों के मामले में अंतिम फैसला लेने की इजाजत देगी। स्पष्ट है कि भारत को 2014 में बेहद सतर्क रहना होगा व अतीत की गलतियों को दोहराने से बचना होगा। यह सुनिश्चित करना खास तौर पर अहम है कि भारत की अफगान नीति पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की आशाहीन आकांक्षा की बंधक न बनने पाए।

अगले कुछ माह अफगानिस्तान के लिए बेहद अहम हैं। अप्रैल में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और नाटो बलों की संख्या भी घटने लगेगी। नाटो सैन्य बलों में कमी आने से तालिबान को फिर से मजबूती हासिल करने का मौका मिलेगा, लेकिन अगर चुनाव सफलतापूर्वक हो जाते हैं तो अफगानिस्तान के सुरक्षा बल एक उदार और लोकतांत्रिक सरकार के अधीन काफी हद तक तालिबान की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

इस समय तो यह आवश्यक है कि राष्ट्रपति करजई सत्ता के सहज हस्तांतरण की तैयारी करें, लेकिन वह अभी भी तरह-तरह के खेल खेल रहे हैं। भारत को उन्हें कुछ परिपक्वता दिखाने की सलाह देने की जरूरत है। इसके साथ ही भारत को अफगान बलों को भी मजबूत बनाना होगा, विशेषकर उन्हें वे हथियार देकर जिनकी इच्छा काबुल ने जताई है।

चीन के साथ भारत के संबंधों के मामले में चुनौतियां एकदम स्पष्ट हैं और यह चुनौतियां केवल सीमा संबंधी समस्या तक सीमित नहीं हैं। भारत के चीन विशेषज्ञ उनसे निपटने में ज्यादा काबिलियत नहीं दिखा सके। इस थके-हारे विचार को बार-बार दोहराने की आदत छोड़ ही दी जानी चाहिए कि दुनिया में भारत और चीन, दोनों के साथ-साथ उभरने की पूरी गुंजाइश है। देवयानी खोबरागडे के मामले ने अमेरिका के साथ हमारे संबंधों की पोल खोल ही दी है। अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते हमारी सामरिक प्राथमिकता अवश्य हैं, लेकिन क्या हमारे पास ऐसी कूटनीतिक क्षमता है कि अमेरिका को यह अहसास कराया जा सके कि देवयानी का मामला हमारे आत्मसम्मान का प्रश्न है और अगर भारत सख्त जवाबी कार्रवाई करता है तो अमेरिका को इसे समझना होगा।

[लेखक विवेक काटजू, विदेश मामलों के विशेषज्ञ हैं] 

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