संपादकीय

दुख किससे कहें दंगों के मारे लोग


राजनीतिक संवेदनहीनता का आईना हैं मुजफ्फरनगर दंगा पीडि़तों के कैंप 


नरेंद्र नाथ 
समाज में नफरत का फैलाव रोकने के बजाय उसपर सियासत करने के परिणाम कितने भयावह होते हैं, इसका अंदाजा उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद बने हालात से लगाया जा सकता है। आतंकी संगठनों ने इस नफरत की आग को और भड़काने की साजिश कर डाली। दिल्ली पुलिस की जांच में यह बात साबित हो चुकी है। सवाल उठता है कि ऐसी नौबत क्यों आई। दरअसल, दंगे के चार महीने बाद भी इसके पीडि़तों के जख्म भरने के बजाय दिनोंदिन हरे ही होते जा रहे हैं। कभी मुलायम सिंह यादव दंगापीडि़तों पर कांग्रेस और बीजेपी का एजेंट होने का आरोप लगाते हैं तो कभी राहुल गांधी उनके आईएसआई से जुडऩे की आशंका जताते हैं। दंगा प्रभावित गांवों के कुछ मु_ी भर लोगों के शांति प्रयासों में साथ देने के लिए इनमें कोई भी आगे नहीं आ रहा है। 
गिरेबान बचाने की चिंता 
दंगे के बीच से वोटों तक का रास्ता बनाने की इस कशमकश में इन हजारों लोगों का दर्द कहीं खो सा गया है। यूपी सरकार फजीहत से बचने के लिए राहत कैंपों को आनन-फानन में उनकी जगह से हटा रही है। ग्राउंड जीरो पर जाने पर पता चलता है कि अभी वहां सरकार का पूरा ध्यान अपनी छवि दुरुस्त करने पर है। इस कोशिश में उसकी और फजीहत हो रही है। अभी तक स्थिति यही है कि दंगे के बाद से मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाके तमाम महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए दंगा टूरिज्म का गढ़ बन गए हैं। इसके समानांतर ब्लेम-गेम की तू-तू-मैं-मैं अलग चल रही है। दंगा प्रभावित गांवों में अभी भी पीएसी जवानों के कैंप लगे हुए हैं। सुनसान घरों में टहलते टीवी कैमरे इलाके के माहौल में तल्खी बढ़ाने की भूमिका निभा रहे हैं। आए दिन टकराव की छिटपुट खबरें भी आ रही हैं। लेकिन प्रदेश सरकार इन पहलुओं पर नजर रखने के बजाय विस्थापितों के कैंप हटाकर मामले को डायवर्ट करना चाहती है। 
जानकार बताते हैं कि अखिलेश सरकार के बीते डेढ़ वर्षों में एक के बाद एक दंगे इसी कैजुअल एप्रोच के कारण हुए। इस बार भी दंगों के बाद स्थायी हल तलाशने के बजाय सारी कोशिश समस्या से फौरी निजात पाने पर ही है। उत्तर प्रदेश सरकार को यह बात नागवार गुजरी कि दिल्ली से सटा होने के कारण दूसरी पार्टियों के बड़े नेता अक्सर वहां पहुंचने लगे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दो बार राहत शिविर का दौरा कर चुके हैं। मीडिया की नजर में शिविर की बदइंतजामी भी आ गई। तीन दर्जन से अधिक बच्चों की मौत राहत कैंप में ठंड से हो गई और सरकार के नेता और अफसर इसपर व्यंग्य भरे कमेंट मारते रहे। दरअसल दंगों को लेकर एसपी का आकलन यह था कि वह मुसलमानों की रहनुमा बनकर उभरेगी और लोकसभा चुनाव से पहले उनके जख्मों पर इस तरह मरहम लगाएगी कि वे उसके मुरीद हो जाएंगे। लेकिन दांव उलटा पड़ा। जख्मों पर मरहम की जगह नमक लग गया। 
राहत की एक बानगी देखें। 80 साल के जुबैर के 6 बालिग लड़के हैं और सभी अपना अलग घर बसा चुके हैं। लेकिन प्रशासन ने उन्हें मात्र एक परिवार मान कर पुनर्वास के नाम पर 5 लाख रुपये पकड़ा दिए। जिस दिन सबसे बड़े राहत कैंप लाई के लगभग पांच सौ परिवारों को वहां से हटने का फरमान सुनाया गया , उस दिन ऑन रिकार्ड मात्र 155 लोगों को राहत की राशि मिली थी। चार महीने बाद भी अगर सरकार इन्हें ढंग से राहत नहीं दे पाई तो फिर किस बात के लिए इतना गाल बजाया जा रहा है ? राहत कैंप से हटने वालों को कोई निश्चित ठौर - ठिकाना नहीं बताया जा रहा है। सरकारी फैसले के अनुसार उन्हें बगल में कहीं पक्के मकान में शिफ्ट किया जाएगा। लेकिन खुद प्रशासन का कहना है कि वह सभी पीडि़तों को आवास देने की स्थिति में नहीं है। इस पर प्रदेश सरकार का कहना है कि कई पीडि़त महज नाटक कर रहे हैं और वे फर्जी तरीके से सरकारी लाभ लेने के लिए यहां आ गए हैं। 
कौन किसका एजेंट 
सवाल उनके सामने भी है , जिन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा मिल चुका है। वे अपने गांव से सब कुछ गंवा कर आए हैं। ऐसे में कहीं जमीन खरीदकर घर बनाने में उन्हें वक्त लगेगा। वे सरकार से यह वक्त चाहते हैं। जहां से वे उजड़ कर आए हैं , उन गांवों में जाने को बिल्कुल तैयार नहीं है। न ही उन्हें वहां लौटाने की कोई गंभीर कोशिश हुई है। कैंप से पीडि़तों को लौटाने के लिए बीच - बचाव करने को कोई राजी नहीं है। दंगे कई ऐसे इलाकों में भी हुए हैं , जहां 1947 और 1991 में भी नहीं हुए थे। कैंप में आतंकी साजिश के बारे में पूछने पर लोग रो देते हैं। वे अपने मासूम बीमार बच्चों और औरतों की दशा दिखाकर पूछते हैं कि इनमें कौन कांग्रेस - बीजेपी या फिर आईएसआई का एजेंट दिखता है। राहत कैंप के लोग अभी लाचार हैं। चुप हैं। लेकिन उनकी चुप्पी में कई सवालों की गूंज है , जिसका असर सियासत के ऊंचे पायदानों तक पहुं चेगा।
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